किशोर पारीक "किशोर"

किशोर पारीक "किशोर"

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किशोर पारीक 'किशोर' गुलाबी नगर, जयपुर के जाने माने कलमकार हैं ! किशोर पारीक 'किशोर' की काव्य चौपाल में आपका स्वागत है।



सोमवार, अगस्त 03, 2009

अपनी चादर तान सखे

चिंतन सबका यही बचा हैं आम सखे
कैसे भी हों, अपनी झोली में दाम सखे
नैतिकता, मर्यादा, सच्‍चाई के गोली मारो
पैसा हैं तो जग में होता, नाम सखे
लिये फिर रहा रात, हाथ में जो खंजर
सुबह देखिये उसके, मुख पर राम सखे
बैग भरी डिगरियां, आँख में आंसू हैं
जिन हाथों को नहीं मिल रहा काम सखे
येन केन प्रकारेण जिसने पाली कुर्सी
गधे खा रहे उसके घर बादाम सखे
बेबस मां बापों की लाचारी के कारण
श्रंगार किया महफिल में थामे जाम सखे
स्‍वप्‍न पूर्ण कैसे होंगे गांधी बाबा के
सिंहासन पर क़ाबिज़ हैं, सुखराम सखे
नहीं समय सुनने का, किशोर तेरी तक़रीरें
तू भी जाकर अपनी चादर तान सखे
किशोर पारीक "किशोर" ग़ज़ल

3 टिप्‍पणियां:

  1. kishorji !
    buraa na maane, ghazal ke har sher kaa doosraa misaraa to theek hai kintu pahale misare kee bunaawat aur kasaawat par dhyaan dene kee jaroorat hai.

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  2. उल्टे सीधे सब कर डालो काम सखे
    जैसे भी हो जग में करलो नाम सखे
    दुनिया भर में जो भी अच्छा होता है
    उनका श्रेय लिखो ख़ुद अपने नाम सखे
    बिगड़ गया कुछ उससे पल्ला झाड़ चलो
    औरों के सर धर दो हर इल्जाम सखे
    गुलशन के काँटों से हमको मतलब क्या
    गुल को थामो बन जाओ गुलफाम सखे
    कुछ भी करो जुगाड़ भिडाओ काँटा तुम
    अपने नाम करालो हर ईनाम सखे
    रोज सवेरे कान पकड़ तौबा करलो
    खूब सजाओ महफ़िल भी हर शाम सखे
    मुफ्त दे दिया ज्ञान तुम्हें इतना अब तो
    "जोगेश्वर" को करने दो आराम सखे

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  3. इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

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