किशोर पारीक "किशोर"

किशोर पारीक "किशोर"

किशोर पारीक "किशोर" की कविताओं के ब्लोग में आपका स्वागत है।

किशोर पारीक 'किशोर' गुलाबी नगर, जयपुर के जाने माने कलमकार हैं ! किशोर पारीक 'किशोर' की काव्य चौपाल में आपका स्वागत है।



गुरुवार, अप्रैल 01, 2010

बिन फेरे हम तेरे

पशु हार्ट अटेक से नहीं मरते
क्‍यों कि बो शादी नहीं करते
क्‍या आदमी उससे भी गया गुजरा हैं
शादी तो साक्षात दासता का पिंजरा हैं
महाराष्‍ट्र में लिव इन रिलेशन ने,
संबंधों पर मोहर लगाई हैं
बल्लियों उछल रहें हैं लाखों कुँवारे
यह बात उन्हें बहुत पसंद आई हे1
आदमी कुंवारा पैदा हुवा था,
कुंवारा ही जिये, कुँवारा ही मरे
जहां कही स्वादिष्ट चारा देखे,
वहीं चरे
अब भविष्‍य में शादी की क्‍या गरज
क्‍यू बिगड़ावे अपनी विगत
अब अनेक बुराइयों का होगा
दी एंण्‍ड
क्‍यों कि ना वाइफ होगी,
ना हसबेण्‍ड
पति, पत्‍नी और वो का चक्‍कर भी
दूर होगा ना लड़की मजबूर होगी
ना लड़का मजबूर होगा
लाफटर लतीफ़ों में कैसे
पत्नी को कोसेगें
कवि गीतों में कैसे
हास्‍य परोसेगें
घर घर सियासत की तरह
गठ बंधन होंगे
सत्‍ता सुख की तर्ज पर
गृह सुख मिल बांट खायेंगे
क्लेश हुवा तो फिर
अलग अलग हो जायेगें
जब मूढ़ हुवा तो
बिन फेरे हम तेरे
नहीं तो तू तेरे मैं मेरे
सबसे ज्‍यादा चिंता तो हमें
एकता कपूर की सता रही हैं

वो पठठी तो ज्‍यादातर
सास बहू के सिरियल ही बना रही हैं
अब बन्‍द हो जायेगा
सालियों का जूते छिपाना
भूल जायेगें सलमान का वो गाना
दीदी तेरा देवर दीवाना
हाय राम कुडियों को डाले दाना
अब बेटी के बाप को
चौरासी लाख योनियों के
संचित पाप को
बेटे के बाप
अर्थात पीवने सांप
के चरणों में पग़डी रखने की
नौबत नहीं आयेगी
आँखें भी आंसू नहीं बरसायेंगीं
न ही बिटिया दहेज़ के लिये
जलाई जायेगीं
लिव इन रिलेशन हेतु
अब कुण्‍डली नहीं
सेलेरी स्लिप की बात होगी
सुहाग रात प्रत्‍येक रात होगी
पिछले प्रेम संबंधों का नहीं होगा फेरा
एक के मरते ही दूसरे की जिंदगी में
फिर आयेगा नया अँधेरा
नया फूल देखकर तितलियां
गुनगुनायेगी
सुन्‍दर घाट देखते ही मछलियां
आशियाना वहीं बसायेगी
मियां बीबी राज़ी तो क्‍या करेगा काजी
जैसे नारे होंगे बहुतेरे
या गाने होंगे बिन फेरे हम तेरे
सेक्‍स, रोमांस, मोज-मस्ति,
हम तो नये जमाने की बात करतें हैं
सांस्‍कृतिक पतन, चरित्र हनन,
ये आप किस जमाने की बात करतें हैं।
किशोर पारीक " किशोर" 

6 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्‍दर घाट देखते ही मछलियां
    आशियाना वहीं बसायेगी
    मियां बीबी राज़ी तो क्‍या करेगा काजी
    जैसे नारे होंगे बहुतेरे
    या गाने होंगे बिन फेरे हम तेरे
    सेक्‍स, रोमांस, मोज-मस्ति,
    हम तो नये जमाने की बात करतें हैं
    सांस्‍कृतिक पतन, चरित्र हनन,
    ये आप किस जमाने की बात करतें हैं।


    करारी चोट मारी है. सामयिक है

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  2. अब फेरों में कौन समय बर्बाद करे।

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  3. दुनिया कितने भी नए नए प्रयोग करे .. लौटकर पुराने युग में आना ही होगा .. बहुत जांचे परखे हुए हैं हमारे प्राचीन नियम .. सिर्फ इसके अवगुणों को सुधारने की आवश्‍यकता है !!

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  4. कही आधुनिकता के होड़ में हम अपनी संस्कृति और मानव समाज को भूलकर पुनः आदिवासियों के काल में प्रवेश न कर जाये

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  5. करारी चोट मारी है. सामयिक है

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