किशोर पारीक "किशोर"

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शनिवार, मई 08, 2010

राजस्थानी ढूंढाड़ी के पितामह बुद्धि प्रकाश पारीक


ढूंढाड़ी के पितामह बुद्धि प्रकाश पारीक


गुलाबी नगर जयपुर के  प्रख्यात हास्य कवि , राजस्थानी  ढूंढाड़ी के पितामह बुद्धि प्रकाश पारीक   का २२ अप्रैल   को  जयपुर  में निधन हो गया। बुद्धि प्रकाशजी  ने अपनी सहज, सरल  ढूंढाणी भाषा में विशेष रूप से व्यंग्यात्मक काव्य के द्वारा अपनी एक खास पहचान बनाई। वे राजस्थानी भाषा के अतिरिक्त हिंदी, उर्दू व ब्रज भाषा में भी पूर्ण अधिकार पूर्व काव्य सृजन करते थे। प्रकाशित कविता संग्रह में चूंटक्यां, चबड़का, तिरसा, कलदार, सिणगार, मैं गयो चांद पर एक बार, नाक और इंदर सूं इंटरव्यू इनकी खास रचनाएं थीं, उनका एक समग्र मै ‘मै‘ भी प्रकाशित हो चुका है।  इन रचनाओं की  बदौलत उन्होंने कई दशकों तक श्रोताओं के दिलों पर राज किया। आज के भड़ैती भरे काव्य मंचोंपर उनकी उपस्थिति मात्र से बल मिलता था। वे आंचलिक बिंबों के प्रयोगधर्मा कवि के रूप मे याद किये जायेंगे।
          मेरे पिताश्री बिहारी शरण जी उनके शिष्यों में से होने के कारण  मैं भी गत १० वर्षों से बुद्धि प्रकाशजी के सानिद्य में कविता की  पाढ्शाला  जय साहित्य संसद  का विद्यार्थी था। विगत ५ दशकों से प्रत्येक  माह के अंतिम रविवार को जय साहित्य संसद की उनके घर पर काव्य गोष्ठी की निरंतरता अदभुद थी। कविता के प्रति उनकी निष्ठा इस बात से रेखंकित की जा सकती है की परिवार में शादी, उत्सव  यहाँ  तक की गमी में भी उनने काव्य गोष्ठी नहीं रुकने दी ।  उनको कवि रत्न, साहित्यश्री, लंबोदर, मिर्जा गालिब व मारवाड़ी सम्मेलन का सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया गया। गत वर्ष नवम्बर माह में जयपुर समारोह के अवसर पर राजस्थानी भाषा साहित्य अकादमी बीकानेर द्वारा जयपुर में उन्हें सम्मानित किजा गया । ब्रज भाषा अकादमी की ओर से भी उन्हें सम्मानित किया गया था !
      बुद्धि प्रकाशजी स्वभाव से जितने मिलनसार, हंसमुख और सहज थे, उतनी ही सहज उनकी लेखनी भी थी। कहीं कोई क्लिष्टता नहीं, बनावट नहीं। वे पारदर्शी कवितायें रचते रहे। जिस तरह स्वच्छ जल को अंजुरी में लेकर उसमें झांकने पर स्वयं की हथेली और उसकी रेखायें नजर आती हैं, कुछ इसी तरह जिसने भी बुद्धि प्रकाशजी को पढ़ा या मंच पर कविता पढ़ते हुये सुना है, उसे अनुभव हुआ होगा। उनकी कविताऒं ने  समकालीन भारतीय समाज की अनेक विसंगितियों की झलक साफ दिखाई पड़ती हैं। अपनी रचनाऒं में इतना सरल, सपाट और सहज दीखते थे  कि एक बारगी  उनकी कविताऒं पर किसी अतिरिक्त टिप्पणी की आवश्यकता महसूस नहीं होती ।बुद्धि प्रकाशजी की सृजन प्रतिभा को किसी विधा विशेष में नहीं बांधा जा सकता। वे गीत भी रचते रहे ग़ज़ल और दोहे भी। उन्होंने गद्य में भी लेखनी चलायी। जयपुर की कविता परम्परा से व्यंग्य विनोद को आलंबन के रूप में ग्रहण करते रहे। छंद को तोड़ा नहीं लेकिन शिष्टता और विशिष्टता का परिधान पहनाकर अपने रचनाऒं को भदेसपन से बचाते रहे। वे अक्सर अपनी बात कहने के लिये रस्सी का दूसरा सिरा पकड़ते थे। उनकी ‘ईं मिन्दर से कोइ म्हारी लग्यो ज्यूंता चोर‘ में गयो पूछ्बा समंचार‘ कविताऒं में इसे महसूस किया जा सकता है।

किशोर पारीक किशोर

2 टिप्‍पणियां:

  1. बुद्धि प्रकाश जी को मेरी विनम्र श्रद्धाञ्जलि ।

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  2. ढ़ूंढाड़ी भाषा के बारे में हिन्दी विकि पर कुछ लिखने न ! चार-पाँच वाक्य से लेकर सौ-दो सौ शब्दों तक का लेख कुछ भी चलेगा। यह भाषा किन-किन जिलों में बोली जाती है; कुछ व्याकरण; कुछ शब्दावली आदि लिख सकते हैं।

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