किशोर पारीक "किशोर"

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किशोर पारीक 'किशोर' गुलाबी नगर, जयपुर के जाने माने कलमकार हैं ! किशोर पारीक 'किशोर' की काव्य चौपाल में आपका स्वागत है।



शुक्रवार, जुलाई 01, 2011

सावन की मंद फुहार, बदरिया बरसो तुम

सावन की मंद फुहार, बदरिया बरसो तुम
कोयलिया कहे पुकार, बदरिया बरसो तुम

उमस हमको धमकाए
गरमी ने होश उडाए
तन से चू रहा पसीना
धाराऍं सहस बहाए
जग करता हाहाकार
बदरिया बरसो तुम

सावन की मंद फुहार, बदरिया बरसो तुम
कोयलिया कहे पुकार, बदरिया बरसो तुम

बदला सब चलन कुदरती
ऋतुऍं अब है छल करती
हरियाली के बिन ऐसी
लग रही हमारी धरती
बैरागिन बिन श्रंगार
बदरिया बरसो तुम

सावन की मंद फुहार, बदरिया बरसो तुम
कोयलिया कहे पुकार, बदरिया बरसो तुम

नन्‍हें मुनहे कुम्‍भलाऍं
तुम आओ तो मुस्‍काऍं
कागज से निर्मित नैया
तुम बरसो तो तैराऍं
उपजे उल्‍लास अपार
बदरिया बरसो तुम

सावन की मंद फुहार, बदरिया बरसो तुम
कोयलिया कहे पुकार, बदरिया बरसो तुम


है चारों और उदासी
नदियॉं ले रही उबासी
तालाब तक रहे अबंर
झीलें प्‍यासी की प्‍यासी
झड लगे मूसलधार
बदरिया बरसो तुम

सावन की मंद फुहार, बदरिया बरसो तुम
कोयलिया कहे पुकार, बदरिया बरसो तुम

kishore pareek "kishore"

3 टिप्‍पणियां:





  1. आहा ! इस ख़ूबसूरत गीत को अब पढ़ने का सौभाग्य मिला …
    प्रियवर किशोर जी


    बदला सब चलन कुदरती
    ऋतुऍं अब है छल करती
    हरियाली के बिन ऐसी
    लग रही हमारी धरती
    बैरागिन बिन श्रंगार
    बदरिया बरसो तुम

    वाह वाह ! बहुत ख़ूब !

    नन्‍हें मुन्ने कुम्हलाएं
    तुम आओ तो मुस्‍काएं
    कागज से निर्मित नैया
    तुम बरसो तो तैराएं
    उपजे उल्‍लास अपार
    बदरिया बरसो तुम

    :) आनंद आ गया !

    बधाई और मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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