किशोर पारीक "किशोर"

किशोर पारीक "किशोर"

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बुधवार, दिसंबर 14, 2011

नव वर्ष 2012 शुभकामना

नये वर्ष पर मॉं शारदा से अरदास


देना मॉं अनुपम उपहार, देना मॉं अनुपम उपहार,

नए साल में मि‍ल जाये मॉं , खुशि‍यॉं अपरम्‍पार ।


मि‍टटी, अंबर,आग, हवा, जल, में मॉं नहीं जहर हो,

सूखा, वर्षा, बाढ, सुनामी का मां नहीं कहर हो,

रि‍तुऐं, नवग्रह, सात स्‍वरों की हम पर खूब महर हो,

धरती ओढे चुनरधानी, ढाणी, गांव, शहर हो,

दशो दि‍शाओं का कर देना, अदभुद सा श्रंगार ।

देना मॉं अनुपम उपहार, देना मॉं अनुपम उपहार,

नए साल में मि‍ल जाये मॉं , खुशि‍यॉं अपरम्‍पार ।


शब्‍दों के साधक को देना, भाव भरा इक बस्‍ता

मुफलि‍स से मॉं दूर करो तुम, कष्‍टों भरी वि‍वशता

ति‍तली गुल भवरों को देखें, हरदम हंसता हंसता

दहशतगर्दों के हाथों में भी दे मॉं गुलदस्‍ता

कल कल करती मां गंगा फि‍र, मुस्‍काये हर बार

देना मॉं अनुपम उपहार, देना मॉं अनुपम उपहार,

नए साल में मि‍ल जाये मॉं , खुशि‍यॉं अपरम्‍पार ।


मंदि‍र के टंकारे से, नि‍कले स्‍वर यहॉं अजान के

मस्‍जि‍द की मि‍नारें गायें नगमें गीता ज्ञान के

मि‍लकर हम त्‍योंहर मनाऐं, होली और रमजान के

दुनि‍यां को हम चि‍त्र दि‍खाऐं ऐसे हि‍न्‍दुस्‍तान के

अमन चैन भाई चारे की होती रहे फुहार

देना मॉं अनुपम उपहार, देना मॉं अनुपम उपहार,

नए साल में मि‍ल जाये मॉं , खुशि‍यॉं अपरम्‍पार ।



कि‍शोर पारीक 'कि‍शोर'

शुक्रवार, जुलाई 01, 2011

सावन की मंद फुहार, बदरिया बरसो तुम

सावन की मंद फुहार, बदरिया बरसो तुम
कोयलिया कहे पुकार, बदरिया बरसो तुम

उमस हमको धमकाए
गरमी ने होश उडाए
तन से चू रहा पसीना
धाराऍं सहस बहाए
जग करता हाहाकार
बदरिया बरसो तुम

सावन की मंद फुहार, बदरिया बरसो तुम
कोयलिया कहे पुकार, बदरिया बरसो तुम

बदला सब चलन कुदरती
ऋतुऍं अब है छल करती
हरियाली के बिन ऐसी
लग रही हमारी धरती
बैरागिन बिन श्रंगार
बदरिया बरसो तुम

सावन की मंद फुहार, बदरिया बरसो तुम
कोयलिया कहे पुकार, बदरिया बरसो तुम

नन्‍हें मुनहे कुम्‍भलाऍं
तुम आओ तो मुस्‍काऍं
कागज से निर्मित नैया
तुम बरसो तो तैराऍं
उपजे उल्‍लास अपार
बदरिया बरसो तुम

सावन की मंद फुहार, बदरिया बरसो तुम
कोयलिया कहे पुकार, बदरिया बरसो तुम


है चारों और उदासी
नदियॉं ले रही उबासी
तालाब तक रहे अबंर
झीलें प्‍यासी की प्‍यासी
झड लगे मूसलधार
बदरिया बरसो तुम

सावन की मंद फुहार, बदरिया बरसो तुम
कोयलिया कहे पुकार, बदरिया बरसो तुम

kishore pareek "kishore"

गुरुवार, फ़रवरी 17, 2011

चार दि‍न की जि‍न्‍दगी की,सि‍र्फ ये कहानी

चार दि‍न की जि‍न्‍दगी की,सि‍र्फ ये कहानी

भौर हुई सांझ हुई, बीती जवानी

सावन भी आयेगा, सावन भी जायेगा
सावन लुभायेगा, मन को हर्षायेगा
सुन्‍दर ये झरना क्‍या, पतझड से डरना क्‍या
मौसम पर रोना क्‍या, मौसम पर हंसना क्‍या
उंची नीची मोंजों पर, नाव है चलानी
चार दि‍न की जि‍न्‍दगी की,सि‍र्फ ये कहानी
भौर हुई सांझ हुई, बीती जवानी


पोथी सा बाना है, अक्षर खजाना है
शब्‍दों को तोल-तोल,प़ष्‍ठ को सजाना है
आवरण दि‍खावा है, जि‍ल्‍द भी छलावा है
कथ्‍य में जो दावा है, शि‍ल्‍प भी भुलावा है
आरभं से अन्‍त तक, बात बचकानी
चार दि‍न की जि‍न्‍दगी की,सि‍र्फ ये कहानी
भौर हुई सांझ हुई, बीती जवानी

जब से हम जागे हैं, बदहवास भागे है
सागर उलांघे है, पर्वत छलांगे है
बेबस अभागे हैं, हीरों को त्‍यागें है
खुशबू को भागे ये, सांसों के धागे है
खोज तेरे अन्‍दर की, यार इत्रदानी
चार दि‍न की जि‍न्‍दगी की,सि‍र्फ ये कहानी
भौर हुई सांझ हुई, बीती जवानी

राधा कन्‍हाई हैं, गुरू ग्रन्‍थं साई है
मुस्‍लि‍म ईसाई ने, बात ये सि‍खाई है
अक्षर अठाई है, सच्‍ची पढाई है
जग से वि‍दाई में, बस ये कमाई हैं
धरती से अम्‍बर तक, साथ यही जानी
चार दि‍न की जि‍न्‍दगी की,सि‍र्फ ये कहानी
भौर हुई सांझ हुई, बीती जवानी
चार दि‍न की जि‍न्‍दगी की,सि‍र्फ ये कहानी

कि‍शोर पारीक 'कि‍शोर'



शनिवार, जनवरी 01, 2011

पतंग और दुनियादारी

पतंग और दुनियादारी


नील गगन के विस्तृत नभ पर, पंतग उडी है इधर उधर
सर- सर- फर-फर-सर- सर-फर-फर -सर- सर-फर-फर -सर- सर-फर
जब तक स्वांसों के माझें संग, इसकी यारों बनी रहे
हरसाए हम देखो तब तक आकाशों मैं तानी रहे
पवन बह रही कितनी सुन्दर, फिर भी क्यों हिचकोले हैं
होडवाद के चक्कर में तो, लगतें ये झकझोलें  हैं
पवन रहे अनुकूल इसी पर रहता है कन्ना निर्भर
झोंका नीचे खाने पर, लगने लगता हमको डर
पक्की सद्दा के संग रब हम, तेज़ स्वभाव को    बांधेगे
देर तलक अपना कन्कोवा, आसमान में में टांगेंगे
केवल तन चखी चाहो तो कारलो इसको इधर उधर
सर- सर- फर-फर-सर- सर-फर-फर -सर- सर-फर-फर -सर- सर-फर
नील गगन के विस्तृत नभ पर, पंतग उडी है इधर उधर

सूत्र हमारे हाथों में पर मन  पंतंग ज्यों डोल रहा
पेच लड़ने कोई आया तो भिड़ने को बोल रहा
अक्सर छोटों को बड्कों से , हमने तो कटते देखा
पिसल्ची को बड़ी ढाल से, बचते और भागे देखा
खिंच जायेगी झट से भैया, लालच में आओगे गर
दूर रहो दंगल बाजों से निरपेक्ष भाव से देखो भर
तब  तक कनखी उडती रहती, जब तक डोरी हाथ है
पतंग डोर का चोली दामन, जैसा होता साथ है
इक बिन दूजे ही होती, बिलकुल नहीं कदर
 सर- सर- फर-फर-सर- सर-फर-फर -सर- सर-फर-फर -सर- सर-फर
नील गगन के विस्तृत नभ पर, पंतग उडी है इधर उधर

मझां होता तेज़ स्वाभाविक, किरच काच की रहती है
बेचारी सादा जुल्मों को मूक हुई सी सहती है
कांफ पतंग की रीड लचीली, वही पतंग की शान है
अकडपना और कड़कपना तो, मुर्दों की पहचान है
सुन्दरता के चक्कर में तुम, कई जोड़ की लाओगे
बीच भंवर में फँस जाओगे, रोवोगे चिल्लाओगे
मोह छोड़ दे रंगों का तो, खुश रहे हर नारी नर
सर- सर- फर-फर-सर- सर-फर-फर -सर- सर-फर-फर -सर- सर-फर
नील गगन के विस्तृत नभ पर, पंतग उडी है इधर उधर


किशोर पारीक" किशोर"

शुक्रवार, नवंबर 05, 2010

लक्ष्मी माँ उनके घर जाना,

लक्ष्मी माँ उनके  घर जाना,
जिन्हें न सुलभ अन्न का दाना
पूरा पेट नहीं भर  पाते
प्राय:  चूल्हा नहीं जलाते
आँचल मैं नहीं दूध  की झारी
नन्हा कैसे ले किलकारी
कबतक इनको इनकी मांए
परी कथाओं से बहलायें
ज्वार बाजरे की कुछ मोटी
सपने में भी दिखती रोटी
वहां किरण अपनी बरसना  
लक्ष्मी माँ उनके  घर जाना,
ना ना   रूप धरे तू आती
उनपर वैभव है बर्षाती
श्वेत आवरण, करके  धारण
जिनका है माँ भ्रष्ट  आचरण 
उनके भय से मुक्ति पाने 
मैंने लिखे कई तराने 
कोई  पर्वत कोई राई
बड़ी विषमता की यह खाई   
भूल गए हैं जो मुस्काना
                                                  लक्ष्मी माँ उनके  घर जाना
हे महालक्ष्मी, हे किरणमलिका!  
महंगाई की देख तालिका
हर वस्तु  बाबा के मोल
उस पर भी ना पूरा तोल
अरबों के करते घोटाले 
बहते हैं मदिरा  के नाले  
अपमिश्रण औ  नकली मॉल
चाहे मावा या हो  दाल
कड़ी धूप में है मजबूर 
हे माँ  भारत का मजदूर   
 बनिए का है सूद चुकाना
 लक्ष्मी माँ उनके  घर जाना

हे सागर की बेटी  अबके
धन को ना तरसे ये तबके
सोच हुआ बाजारू मैया
डूब रही हर घर की नैया

मिला नहीं आय का धंदा
गर्दन में लटकाते फन्दा
दुःख के पर्वत चारों और
छाया अन्धकार घनघोर
चहें कुबेर का नहीं खज़ाना
लक्ष्मी माँ उनके  घर जाना 

 किशोर पारीक " किशोर"






शनिवार, अक्टूबर 16, 2010

धरती का स्वर्ग जिसे कहते क्या वह कश्मीर हमारा है

हे भारत में रहने वालों, क्या तुमने कभी विचारा है
धरती का स्वर्ग  जिसे कहते क्या वह कश्मीर  हमारा है
अपनी धरती अपने भाई, लगते पर बेगाने है
दिल में भरा हलाहल है, सांपों सी फटी जुबाने हैं
खुले आम भारत माता को, गाली  देकर झाड़ रहे
संविधान की उडा धज्जियाँ, ध्वजा  तिरंगा फाड़ रहे
दर्जा दिया विशिष्ट राज्य का, लुटा दिए हैं हमने दाम
नेताओं की उन भूलों के, भोग रहें है दुष्परिणाम
अपने घर से बेघर होकर, कितने पंडित चले गए 
साम्प्रदायी चालों में,देखो  बेचारे छले  गए
हम गैरों से नहीं  हारे हैं, हमकों अपनों ने मारा है
धरती का स्वर्ग  जिसे कहते क्या वह कश्मीर  हमारा है

सत्ता के गलियारों को, आतंकी अब हांक रहे 
तुष्टिकरण की पंजिरी , काश्मिरी नेता फांक रहे
कश्मीर नही भैया कोई , भूमि का  केवल टुकड़ा
भारत का ये  भाल मुकुट ,इससे ही खिलता है मुखड़ा
आशंका है नहीं बंधुवर, तन मन धन और प्राण की
सिर्फ बात है भारत माँ के, स्वाभिमान सम्मान की
उनकी नज़रों में अब अपना, वहां नहीं स्थान है
सौ करोड़ भारतवासी का, कैसा ये अपमान है
देश भक्त हिन्दुस्तानी को, करना प्रतिकार करारा है 
धरती का स्वर्ग  जिसे कहते क्या वह कश्मीर  हमारा है
अपनों की राहों में देखो, खोद रहे नित खड्डे हैं
यहाँ देश में खोफनाकं, चल रहे आठ सौ अड्डे हैं
कोइ कहता पाकिस्तानी, मुद्रा चले धडल्ले से
आंतंकी  को नोट मिल रहे, पाकिस्तानी गल्ले से
अफज़ल की माताजी,शायद लगती है  मांसी
इसीलिए ना दे पायें हैं, अफज़ल को अब तक फांसी
मुफ्ती की बेटी अपहरण का, खेला नाटक झूठा था
इसी बहाने आंतंकी दल, काराग्रह से छूटा था
अलगाव वाद की साजिश ने, फिर से हमको ललकारा है
धरती का स्वर्ग  जिसे कहते क्या वह कश्मीर  हमारा है
बहू संख्यक को गाली देना, इनकी रोज़ी रोटी है

सच्चाई जो  कह ना पाए, कलम समझ लो खोटी है
मुंह खोलें जब भी हम अपना, राजनिति का है इल्जाम
क्या संत समागम करते हैं, वहां हुर्रियत हो या तालिबान
सच्चाई से आँख मूँद कर, छेड़  रहें है उलटी राग
पत्रकारिता के चेहरे पर, ये सब लगते काले दाग
ये भूमि हमारे बाबा की, चंड्डी का तेज दुधारा है
अब और नही हम हारेंगे, पहले हारा सो हारा है
कोटि कोटि कंठों से हरदम,यही  गूंजता नारा है 
हाँ यह कश्मीर हमारा है, हाँ यह कश्मीर हमारा है
हे भारत में रहने वालों, क्या तुमने कभी विचारा है
धरती का स्वर्ग  जिसे कहते क्या वह कश्मीर  हमारा है

किशोर पारीक"किशोर"

रहा डकार चीन तिब्बत को, सिन्धु नदी तक है आँखे

चाणक्य सरिखे बनो बाज़, सरहद पर करो सफ़र यारों
शुतुरमुर्ग नीति छोड़ो , सिंह बनो फिर ललकारो
लद्दाकी पत्थरों पर उसने, लाल पेंट से चीन लिखा
ना जाने क्यों भारत  मुझको,भीरु निर्बल दीन दीखा
ब्रह्म पुत्र पर बांध बना कर, जल प्रवाह को रोक रहा
रोड बनाते हम लेह मैं, दुस्सासी हमको टोक रहा
नेपाली रास्तों से अक्सर, हथियार भेजता रहता है
नापाक चीन अरुणाचल को, अपना ही कहता रहता है

बहुत गा लिए मंत्र प्रेम के, चेताओ राग मारू गाके
रहा डकार चीन तिब्बत को, सिन्धु नदी तक है आँखे

रविवार, अक्टूबर 03, 2010

कोमनवेल्थ सफल करना है, महरम रख दो घाव पर

अब राष्ट्र प्रतिष्ठा दाव पर, आजाओ सब नाव पर
कोमनवेल्थ सफल करना है, महरम रख दो घाव पर
व्यक्त करें हम क्यों लाचारी, भारत मैं क्षमता अति भारी
रात दिवस सब एक करे हम,  रख बाधा से लड़ना जारी
चाहे अब जो हो जाये, आना नहीं दवाव पर
सुनते है कुछ है घोटाले, चर्चा  के मिल गए मसाले
कहते हैं, बहती गंगा मैं, हाथ सभी ने है धो डाले
विफल हुए तो भद्द देश की, आंच न आने दो प्रभाव पर 

घर के झगडे फिर निपटाना, अभी शिकायत अभी न ताना
प्रेस मीडिया नहीं खुजाये, भ्रस्ट आचरण जख्म पुराना
देश भी अपना खेल भी अपना, धुल डालना है तनाव पर
अब राष्ट्र प्रतिष्ठा दाव पर, आजाओ सब नाव पर
भूलो कोर्ट कचहरी थाना, लक्ष्य हमारा मेडल पाना
थीम सोंग अच्छा है अपना,शेरू के संग हमको गाना
मत दो ध्यान अभी चुगली पर,  निर्भर है सब भाव पर
कलमाड़ी जी कांप रहे हैं, गिल भी फीते नापं  रहे हैं
शीलाजी कुछ घबराई सी, मनमोहन जी हांफ रहे हैं
अब तो खेल शुरू है यारों, डालो जल न अलाव पर
अब राष्ट्र प्रतिष्ठा दाव पर, आजाओ सब नाव पर
कोमनवेल्थ सफल करना है, महरम रख दो घाव पर

गुरुवार, सितंबर 23, 2010

आजाओ बरखा बाहर बन, मन मेरा सरसादो

बिना तुम्हारे जाने कितने, बीते सावन भादो
आजाओ बरखा बाहर बन, मन मेरा सरसादो

हटा आवरण प्रथम पृष्ट से पुस्तक पढ़ खो जाऊं
छंद मयी, मैं तुम्हे बांचकर, कवितामय हो जाऊं
कुटिल नयन-संकेतों से ही, जटिल अर्थ समझादो
आजाओ बरखा बहार बन, मन मेरा सरसादो

शीतलता को भेज धरा पर, रजनीचर मुस्काया
मंद ज्योत्सना की किरणों ने, विस्तारी निज माया
मेरे उर के सतत दाह  पर, दृष्टी - वृष्टी  बरसादो
आजाओ बरखा बहार बन, मन मेरा सरसादो

मिलन अनूठा हो धरती का, जैसे घन अम्बर से
अथवा मदिर कंज कलिका का, होता मस्त भ्रमर से
त्यों ही सघन श्याम कुंतल ये, मेरे मुख छिटका दो
आजाओ बरखा बहार बन, मन मेरा सरसादो

भोर दुपहर सिंदूरी संध्या रातों की तनहाई
सतत प्रतीक्षा में ही मेंने, आधी उम्र बिताई
मोन पड़े जीवन साजों पर, सरगम मधुर बजादो
आजाओ बरखा बहार बन, मन मेरा सरसादो

किशोर पारीक "किशोर"

शुक्रवार, जून 11, 2010

आओ प्रियवर स्नेह तलैया में मिल कर स्नान करे

आओ प्रियवर स्नेह तलैया में मिल कर स्नान करे
एकाकीपन की घड़ियों में, इक दूजे का ध्यान करें

देंखे स्वप्न सलोने सुन्दर, नीड़ बनायें इक अनुपम
मधुर चांदनी में बन  जाएँ,  इक दूजे के हम शबनम
अंतर्मन के अहसासों का, आओ हम पहचान करे
आओ प्रियवर स्नेह तलैया में मिल कर स्नान करे

आहट की अभिलाषाओं में, कब से खुला हुआ मानद्वारा
गीत मिलन के गाता जाता, ह्रदय बना हुआ बंजारा
दोनों के मन प्राण एक हों, तो राहें आसन करें
आओ प्रियवर स्नेह तलैया में मिल कर स्नान करे

मन की दूरी, तन की दूरी, का अंतर अब दूर करें
अंतर्मन के कोरे कागज़ पर,   सतरंगी रंग भरें
आओ अपने अधरों से हम, प्रीत रीत का दान करें
आओ प्रियवर स्नेह तलैया में मिल कर स्नान करे

में हूँ सागर तुम सरिता हो, आओ मुझमें मिल जाओ
मेरे जीवन की बगिया मैं, पुष्प सरीखी खिल जाओ
फिर हम गायें  प्रेम तराने, अदभुद सा ऐलान करें
आओ प्रियवर स्नेह तलैया में मिल कर स्नान करे
एकाकीपन की घड़ियों में, इक दूजे का ध्यान करें
किशोर पारीक "किशोर"

मैंने जब से चलना सीखा, तबसे चलता रहा निरंतर

मैंने जब से चलना सीखा, तबसे चलता रहा निरंतर
धरती नापी, अम्बर नापा, नापे अनगिन दिशा दिशंतर
आदिकाल से इस पल का रुख, जैसा मैंने चाहा बदला 
गिरकर संभला में मुस्काता, राहों पर जब भी में फिसला 
समय चक्र की सीमा तोड़ी,  पार  किये हैं कई युगंतर 
मैंने जब से चलना सीखा, तबसे चलता रहा निरंतर

बाधा बनकर अड़ी हुई थी, ठोकर से चट्टानें तोड़ी
चाहे धुल भरे पथ कितने, मैंने डगर कभी ना छोड़ी
संकट ने देखा जब निश्चय, संग में मेरे  चला तदन्तर
मैंने जब से चलना सीखा, तबसे चलता रहा निरंतर

सूरज से गति की दीक्षा ले, गीत सफलता के में गाता
पांवों में विस्वास लिए, हरदम मंजिल को पा  जाता
तुफानो से टकराता में, सागर का नापा है अंतर
मैंने जब से चलना सीखा, तबसे चलता रहा निरंतर

इसीलिए में कहता हरदम, आशाओं के दीप जलाओ
चाहे अन्धकार हो कितना, पथ पर आगे बढते जाओ
समय घड़ी मुहरत  मत देखो, जादू टोना जंतर मंतर
मैंने जब से चलना सीखा, तबसे चलता रहा निरंतर

किशोर पारीक "किशोर"

शुक्रवार, मई 14, 2010

इतना दूर चला हूँ , फिर भी मंजिल नहीं मिली

गीत

केवल दिखलाने को सारे, कात रहे तकली
मुस्काने जो मिलीं हजारों, ज्यादातर  नकली
घुप्प अँधेरा था पर, कोइ शम्मा  नहीं जली
इतना दूर चला हूँ , फिर भी  मंजिल नहीं मिली

                                                        सपनो की बन्दनवारों ने, मंगलाचरण किया
धूप खिली तो मृगत्रशना ने, सब कुछ हरण किया
आदर्शों की जुजबन्दी से, पोथी गयी सिली
इतना दूर चला हूँ , फिर भी  मंजिल नहीं मिली






बियाबान में थकन उदासी, ओर बिछावन  घास 
लेकिन विधना संग मैं मेरे, इसका  था आभास
मेली चादर फटी हुई सी, वो भी नहीं सिली
इतना दूर चला हूँ, फिर भी मंजिल नहीं मिली

अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर, ढूँढ रहे थे नैन
जिन बिरवों के नीचे बैठा, वो खुद थे बैचेन
कथनी करनी के अंतर मैं,मन   की नहीं चली
इतना दूर चला हूँ , फिर भी मंजिल नहीं मिली

कहा पवन के इक झोकें ने, भर मेरी बाहें
पगडंडी को छोड़  बावले , निर्मित कर  राहें
विश्वासों की चट्टानों से राह  नई निकली
इतना दूर चला हूँ, फिर भी मंजिल नहीं मिली

केवल दिखलाने को सारे, कात रहे तकली
मुस्काने जो मिलीं हजारों, ज्यादातर  नकली
घुप्प अँधेरा था पर, कोइ शम्मा नहीं जली
इतना दूर चला हूँ , फिर भी मंजिल नहीं मिली

किशोर पारीक"किशोर"

सोमवार, अप्रैल 12, 2010

गीत: मांगे फूल मिलें है खार,इनसे कैसे हो सृंगार!

मांगे फूल मिलें है खार,
इनसे कैसे हो सृंगार!
रक्त सना है गोपी चन्दन, थमी धड़कने चुप स्पंदन
कैसी संध्या, कैसा वंदन, आह, कराह, रुदन है क्रंदन
लुप्त हुए   है स्वर वंशी के, गूंजा भीषण हाहाकार
मांगे फूल मिलें है खार,
इनसे कैसे हो सृंगार!
दहके नगर बाग, वन-उपवन,आशंकित आकुल है जन-जन
गोकुल व्याकुल शंकित मधुबन,कहाँ छुपे तुम कंस निकंदन
माताएं बहिने विस्मित हैं, छुटी शिशुओं की पयधार
मांगे फूल मिलें है खार,
इनसे कैसे हो सृंगार!
लड़ती टोपी पगड़ी चोटी, बची इन्ही में धर्म कसोटी
मुश्किल चूल्हे की दो रोटी, अबलाओं पर नज़रे खोटी
सपनो के होते है सोदे,  अरमानो के है व्यापार
मांगे फूल मिलें है खार,
इनसे कैसे हो सृंगार!
बदला नहीं कोई मंज़र, केवल बदले साठ  कलेंडर
संसंद में गाँधी के बन्दर, बेशर्मी से हुए  दिगंबर
थमा सूर तुलसी का सिरजन, अब बारूदी कारोबार
मांगे फूल मिलें है खार,
इनसे कैसे हो सृंगार!

किशोर पारीक "किशोर"

शनिवार, अप्रैल 03, 2010

में धड़कन के गीत लिखूंगा





 में धड़कन के गीत लिखूंगा






वंदन मिले ना,  चाहे मुझको, चन्दन मिले ना चाहे मुझको
नई सुबह के पन्नो पर, में  अपने मन  के मीत लिखूंगा
                                    में धड़कन के गीत लिखूंगा
बादल चाहे कितना गरजे, सूरज से भी अग्नि बरसे 
अपने माँ के अनुपम गुंजन, से में नवनीत लिखूंगा
                                में धड़कन के गीत लिखूंगा
थक कर चाहे सो जाऊंगा, जग कर फिर लिखने आऊँगा 
करदे सराबोर सब जग को, ममतामय में शीत लिखूंगा 
                                 में धड़कन के गीत लिखूंगा
मोसम तो आये जायेंगे, मुझको कहाँ हिला पाएंगे
अग्नि का जो ताप भुजादे , कागज़ पर में शीत लिखूंगा
                              में धड़कन के गीत लिखूंगा
इस बगिया की आंगन क्यारी, मुझको प्यारी हर फुलवारी
हर रिश्ते में जान फुकदे, ऐसी  सुन्दर रीत लिखूंगा   
                                 में धड़कन के गीत लिखूंगा
ओ चिराग गुल करने वालों, चाहे जितना जोर लगालो
जगतीतल को रोशन करदे, ऐसे उज्वल दीप लिखूंगा
                               में धड़कन के गीत लिखूंगा
सागर जितना में गहरा हूँ, अम्बर जैसा में ठहरा हूँ
वर्तमान को सुरभित करदे, अनुपम वही अतीत लिखूंगा
                            में धड़कन के गीत लिखूंगा
चाहे शब्द कहीं खो जाये, स्वर मेरे चाहे खो जाये
फिघलती पावक पर बैठा, में फिर से नवनीत लिखूंगा
                           में धड़कन के गीत लिखूंगा
वंदन मिले ना, चाहे मुझको, चन्दन मिले ना चाहे मुझको

नई सुबह के पन्नो पर, में अपने मन के मीत लिखूंगा
में धड़कन के गीत लिखूंगा
किशोर पारीक " किशोर"

शुक्रवार, अप्रैल 02, 2010

सरस्वती वंदना


सरस्वती वंदना
वंदन तुम्हे शारदा मैया,     मुझको तुम ऐसा वर देना
भावों की अभिव्यक्ति, सहज हो, मुझको तुम ऐसा स्वर देना

स्वर जिनसे मिटती पीडाएं, स्वर जो घावों को सहलाये
स्वर जिनको सुन सब हर्षाये, वे स्वर वाणी में भर देना
                                     मुझको तुम ऐसा स्वर देना
शब्दों में होती है,भविता, शब्दों से पुजतें है, सविता
शब्दों से बनती है,कविता, शब्दों से जड़ता हर लेना
                                मुझको तुम ऐसा स्वर देना
अक्षर ब्रह्म गहन गंभीरा, अक्षर को ही भजति मीरां
ताना-बाना बुने कबीरा, क्षर मत देना अक्षर देना
                               मुझको तुम ऐसा स्वर देना

वंदन तुम्हे शारदा मैया, मुझको तुम ऐसा वर देना

भावों की अभिव्यक्ति, सहज हो, मुझको तुम ऐसा स्वर देना
किशोर पारीक"किशोर"

आज लेखनी खुल कर बोलो

आज लेखनी खुल कर बोलो

आज लेखनी खुल कर बोलो ,
जिन शोलों की तपन घटी है ,
उन्हें उकेरो, उन्हें टटोलो !
आज लेखनी खुल कर बोलो

ज्ञान, ध्यान वैराग्य त्याग के,
पथ पर  तुमने हमें चलाया
या बोरा श्रृंगार जलधि में ,
कभी कहा जग झूठी माया
प्रतिस्पर्ध के इस युग में ,
कुछ कहने से पहले तोलो
आज लेखनी खुल कर बोलो ,

श्रद्धा  नेतिकता सब हारी,
पावस में ज्यो ओझल सावन,
देश राम का कहलाता है ,
आतंकित करते है रावन
युवकों में तुम विप्लव भर दो
शब्दों के सब तरकस खोलो

भटकी हुई आज तरुनाई,
झूटी राहे   मंजिल  झूटी
भाई का भाई है  बेरी
हमसे धरती माता रूठी
विष  तुम पुन: सोंप शंकर को
पियूष अब घर घर में घोलो
आज लेखनी खुल कर बोलो


जड़ में  तुम चेतनता  लाकर
नस नसमे बिजली भर सकती
चन्द्रह्यास बन परम दुधारी
अरि  को तुम आकुल कर सकती
कला है जो सुमुख तुम्हारा
शोंणित में तुम उसे डुबोलो
आज लेखनी खुल कर बोलो

किशोर पारीक"किशोर"

गुरुवार, अप्रैल 01, 2010

मेरे शब्दों में गीतों के भावों में तुम

मेरे शब्दों में गीतों के भावों में तुम
मेरे शब्दों में गीतों के भावों में तुम
क्या संभालोगे मुझको अभावों  में तुम
अपने नयनो   में तुमको बसाये रखूँ
कैसे नायब लगते, अदाओं में तुम
      मेरे शब्दों में गीतों के भावों में तुम
लम्बी रातों को छत  पर, सितारों तले
बंद पलकों से, तुमको निहारा करूँ
मैं मगन हो मुदित, गुनगुनाता रहूँ
सारे कोतुक में, सारी विधाओं में तुम 
    मेरे शब्दों में गीतों के भावों में तुम
मैं किनारा इधर का,उधर के हो तुम
साथ रहते भी हैं, किन्तु मिलते नहीं
गीत मांझी के लगते, सुरीले मगर
मेरी चांहों वन तुम हो, सदाओं में तुम
     मेरे शब्दों में गीतों के भावों में तुम
मुझको महकाओ बन जाओ सौरभ सुमन
आओ शब् में सुनहरे से सपनो में तुम
दिल में बजता रहे, मस्त मुरली का स्वर
गुजों गलियों में गावों, फिजाओं में तुम
       मेरे शब्दों में गीतों के भावों में तुम
जब भी कागज़ पे चाहा, उकेरूँ तुम्हे
अश्क ढलके मेरे, रोशनाई बही
चाहना कामना, भावना, साधना
मेरी आहों निगाहों, दुआओं में तुम
  मेरे शब्दों में गीतों के भावों में तुम
किशोर पारीक "किशोर"

मंगलवार, मार्च 30, 2010

मन मेरे, मन मेरे,मन मेरे, मन, क्यों करता इतना नर्तन

मन  मेरे, मन मेरे,मन मेरे, मन
क्यों    करता  इतना   नर्तन
कभी तरंगीत कभी हताशा, पल में तोला पल में माशा
पल में तो कटुता गह लेता, पल में पानी बीच बताशा
पहन सा भारी हो जाता, अगले ही शण तू कण 
मन मेरे, मन मेरे,मन मेरे, मन , क्यों करता इतना नर्तन

जितना भी में तुझको कसता, उतना तू उलझन में फंसता
व्रस्थी बिंदु सम गिरे धूलि में, अथवा गिरा पंक में धंसता
कंकर पत्थर छोड़ बीनना, उज्जवल मोती बन
मन मेरे, मन मेरे,मन मेरे, मन, क्यों करता इतना नर्तन

उड़े पहाड़ों की श्रेणी  में, कभी चंचला की वेणी में
लिया नहीं संगम में ग़ोता,  नहीं नहाया तिरवेनी में
कबीर की चादर हेरी ना, मीरां का मोहन
मन मेरे, मन मेरे,मन मेरे, मन, क्यों करता इतना नर्तन

मन दसकंदर  को जब जीता, तब विमुक्त शीतलता  सीता
सब ग्रंथों में यही लिखा है, यही कृष्ण अर्जुन की गीता
मनके आगे जो भी हारा, वही रावण और दशानन
मन मेरे, मन मेरे,मन मेरे, मन, क्यों करता इतना नर्तन

दृग मूंदे में ध्यान लगता, मुझे छोड़  तू भागा जाता
स्थीर देह चेतना अस्थिर, जाने कहाँ कहाँ भरमाता
जड़ता तुझसे  लिपटी पगले, बन जा तू चेतन
 मन मेरे, मन मेरे,मन मेरे, मन, क्यों करता इतना नर्तन

मन कुल दीपक मन कुलघाती,मन है दूल्हा आप बाराती
मन ही सीधी -साधी गैया, मन ही है ऐरावत हाथी
मन मेनिज प्रतिबिम्ब देखले, मन अपना  दर्पण
मन मेरे, मन मेरे,मन मेरे, मन, क्यों करता इतना नर्तन

     

सोमवार, मार्च 29, 2010

अब मन किसके आगे खोले, इन घावों को कौन टटोले

अब मन किसके आगे खोले, इन घावों को कौन टटोले
निकली पांख उड़ गए पांखी, ले परवाजें होले-होले

तिनका तिनका नीड़ बनाया,
शायद यह कुदरत की माया
कोई बंधन कम न आया
विकसित कुछ अरमान हुए क्या
बन बैठे वो उड़न खटोले
अब मन किसके आगे खोले, इन घावों को कौन टटोले
निकली पांख उड़ गए पांखी, ले परवाजें होले-होले

टुकुर टुकुर तकते है राहें
अब भी आयें, अब भी आयें
नब को तकती थकी निगाहें
भूल गए घर देश ठिकाना
निकले बहुत  गज़ब के गोले
अब मन किसके आगे खोले, इन घावों को कौन टटोले

निकली पांख उड़ गए पांखी, ले परवाजें होले-होले
इन दर्दों को पीते पीते
यादों की जागीरें जीते
फिर भी हैं रीते के रीते
हम आपनी ममता से कहते
तुम भी बदलो अपने चोलें
अब मन किसके आगे खोले, इन घावों को कौन टटोले
निकली पांख उड़ गए पांखी, ले परवाजें होले-होले

रह रह कर झरते हैं नैना
दिल के टुकड़ों तुम खुश रहना
बाकी क्या तुमसे  कुछ कहना
जाने कब हम सूखे पत्ते
तेज हवा के संग में होले
अब मन किसके आगे खोले, इन घावों को कौन टटोले
निकली पांख उड़ गए पांखी, ले परवाजें होले-होले

रविवार, मार्च 28, 2010

खोया बचपन कैसे लोटे, मित्र पुराने छोटे-छोटे

खोया बचपन कैसे लोटे, मित्र पुराने छोटे-छोटे
यादों की पुरवाई लाये, सावन में झूलों के झोटें

चंदामामा से बतियाना,
धमा चोकड़ी शोर मचाना
माँ के आँचल में छुप जाना
शेतानी पर पापा भरते,
बगल हमारे गजब चिकोटे
खोया बचपन कैसे लोटे, मित्र पुराने छोटे-छोटे
यादों की पुरवाई लाये, सावन में झूलों के झोटें

धरती,अम्बर, नदिया,पानी
परियां, तितली,राजा-रानी,
मीठी नींद सुलाती नानी
रंग बिरंगी, सतरंगी हम
पतंग उड़ाते जा परकोटे
खोया बचपन कैसे लोटे, मित्र पुराने छोटे-छोटे
यादों की पुरवाई लाये, सावन में झूलों के झोटें
भाता जादू खेल मदारी
नहीं सुहाता बस्ता भारी
पढना तो लगता लाचारी
हर इच्छा पूरी होती थी
घर में रहे भले हो टोटे
खोया बचपन कैसे लोटे, मित्र पुराने छोटे-छोटे
यादों की पुरवाई लाये, सावन में झूलों के झोटें
दोडाते कागज़ की नैया
प्यारी लगती गया मैया
हमे जगती रोज चिरैया
रह-रह कर झरते है नैना
कितनी यादें हमें कचोटे
खोया बचपन कैसे लोटे, मित्र पुराने छोटे-छोटे
यादों की पुरवाई लाये, सावन में झूलों के झोटें