किशोर पारीक "किशोर"

किशोर पारीक "किशोर"

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किशोर पारीक 'किशोर' गुलाबी नगर, जयपुर के जाने माने कलमकार हैं ! किशोर पारीक 'किशोर' की काव्य चौपाल में आपका स्वागत है।



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रविवार, अगस्त 28, 2011

थांका नेना की कटार, म्हाके हिवड़े उतरी आर

थांका नेना की कटार, म्हाके हिवड़े उतरी आर
ढग्यो प्रीत रो मीठो ज्वार, दुनियां खेवे छे बीमार  

होठ पांखडी सी गुलाब की, रस बर्सायाँ जावे
मुळको छो बिज़ली सी चिमके,सगळा गश खाजावे
होगा म्हे कितना लाचार, करल्यो म्हासूं आंख्या चार
थांका नेना की कटार, म्हाके हिवड़े उतरी आर
ढग्यो प्रीत रो मीठो ज्वार, दुनियां खेवे छे बीमार  


काची हल्दी सो रंग थांको, कंचन भी हलकों छे
बीच बादल्याँ साँझ सावने, सूरज को पलको छे
लागो रूप का थे कोठ्यार, म्हाने सजनी बीण सिंणगार
थांका नेना की कटार, म्हाके हिवड़े उतरी आर
ढग्यो प्रीत रो मीठो ज्वार, दुनियां खेवे छे बीमार  


मीठी बोली मैं ऐयाँ लागे, कोयलडी गीत सुनावे
जाने कोई पथिक प्यास मैं, गंगा जल पा जावे
बिन कागज चिठ्ठी तार, म्हाने दे द्यो थे संचार  
थांका नेना की कटार, म्हाके हिवड़े उतरी आर
ढग्यो प्रीत रो मीठो ज्वार, दुनियां खेवे छे बीमार  


मैं सागर थे चंचल नंदी, मिलनो बहुत जरूरी
चोखी कोनी थांकी म्हाकी, तन मन की या दूरी
म्हाने करल्यो अंगीकार, थांको माना ला आभार
थांका नेना की कटार, म्हाके हिवड़े उतरी आर
ढग्यो प्रीत रो मीठो ज्वार, दुनियां खेवे छे बीमार  
  

शनिवार, मई 15, 2010

म्‍हारी कविता पोथी पाना, रददी हाळा ने बेच्‍याई

राजस्‍थानी हास्‍य गीत



म्‍हारी कविता पोथी पाना, रददी हाळा ने बेच्‍याई
कविता तो म्‍हारी सोतण छै, घर हाळी कहती घुर्राई


जद भी मैं सरस्‍वती पूजूं, वा खैवे लिछमी जी ध्‍यावो
बैठाओ ड़ोळ कमाई को, घर मांहीं दो पीसा ल्‍याओ
कविता ने छोड़ो बालम जी, चाहे बण जाओं हलवाई
कविता तो म्‍हारी सोतण छै, घर हाळी कहती घुर्राई

अब सूझे ना हीं गीत वीत, नहीं छंन्‍द खोपडी में आवे
क्‍यू थोड़ो घणो सोच पाउं, वा जागै खाबा न धावै
मूंसा की ज्‍यू में जा दुपक्‍यो, वा म्‍यांउ की ज्‍यूं झपटयाई
कविता तो म्‍हारी सोतण छै, घर हाळी कहती घुर्राई

मन का भाव दुब्‍या रैग्‍या, कल्‍पना हुई नो दो ग्‍यारा
अक्षर सें डूब्‍या पाणी में, सब्‍दां की सूखी सब धारा
जद जद कलम उठाउं छूं,  आ जावे छ उंका भाई
कविता तो म्‍हारी सोतण छै, घर हाळी कहती घुर्राई

वा बोली मत पोतो कागज, थे साजन लीडर थे बण जाओ
पीढयां म्‍हाकी तर जावेली, मंचा उपर तण जाओ
झांको लल्‍ली को काको, लड कर चुनाव कुरसी पाई
कविता तो म्‍हारी सोतण छै, घर हाळी कहती घुर्राई

दो कोडी मोल न कविता को, कविता सूं रोटी नहीं मिले
काविता सूं टाबर नहीं पळे, कविता सूं कूण सा फूल खिले
कविता की ठौर बणाओ थे, रूपया, पीसा, आना पाई
कविता तो म्‍हारी सोतण छै, घर हाळी कहती घुर्राई

म्‍हारी कविता पोथी पाना, रददी हाळा ने बेच्‍याई

कविता तो म्‍हारी सोतण छै, घर हाळी कहती घुर्राई

किशोर पारीक 'किशोर'

म्हाने आवे याद घणेरी, आज आपणा गांव की

राजस्‍थानी गीत
म्हाने आवे याद घणेरी, आज आपणा गांव की
‍चौक तिबारा घर की बारयां, बड़ पीपळ की छांव की

सीपाळा की ठंड कड़कती, और सुहाती तावड़ी
कढी मंगोड़ी केर सांगरी, ताती ताती राबड़ी
टाबरपण का साइना सूं, मिल गळबाथा उमाव की
म्हाने आवे याद घणेरी, आज आपणा गांव की

खेतां का गेंला पर जाती, पणिहारंया वे मटके छी
पनघट जाती की रमझोळां, म्हारे हिवडे अटके छी
नेणा कटारयां सूं देवे छी, मीठी पीडा घाव की
म्हाने आवे याद घणेरी, आज आपणा गांव की

तुळसीजी को बड़ो ठांवळो, घर को टाबर लागे छो
चिडि़ चुडकलया की बोलया सुण मैं रोजीना जागे छो
टो्गडिया खातर डकरावण, सुणता धोळी गाय की
म्हाने आवे याद घणेरी, आज आपणा गांव की

आज बटाउ आवळो संदेशो देछो कागलो
कांव कांव सूं गूंज्‍या करतो, म्‍हांका घर को डा़गलो
भरया तासला कांसी का सूं, मणवारां छी चाय की
म्हाने आवे याद घणेरी, आज आपणा गांव की

हेथ हरख का गीत भायला, बिना साज ही गावेछा
गेंद दडी अर गुल्‍ली डंडा, सब में हेत बंधावे छा
पंच चौधरी निपटा दे छा, सगळी बात तळाव की
म्हाने आवे याद घणेरी, आज आपणा गांव की

खेले छा दंगल मेळा में, कब्‍बडडी पाळा रेत में
बरखा होतां ही महकै छी, मांटी म्‍हांका खेत में
मोरण सिटटा और मतीरा, खाता पाळ तळाव की
म्हाने आवे याद घणेरी, आज आपणा गांव की
‍चौक तिबारा घर की बारयां, बड़ पीपळ की छांव की

म्हाने आवे याद घणेरी, आज आपणा गांव की

‍चौक तिबारा घर की बारयां, बड़ पीपळ की छांव की

किशोर पारीक'किशोर'

पाणी हवा विचार प्रदूषण कोडे कोनै

राजस्‍थानी गज़ल
पाणी हवा विचार, प्रदूषण कोडे कोनै
जात, धरम दीवार, प्रदूषण  कोडे कोनैं
दफतर का बाबू अर, अफसर रिश्‍वत लेवै
खावे बिना डकार, प्रदूषण कोडे कोनैं
राजनीति का दंगल में, छै घाला मेली
सगला रंग्‍या सियार, प्रदूषण कोडे कोनैं
गीतां का भावां में, अब रंगत कोनै
बरसे नहीं रसधार, प्रदूषण कोडे कोनैं
खोटा सिक्‍का चले, धडल्‍ला सूं बाजार मँ
लोकतंत्र  लाचार, प्रदूषण कोडे कोनैं
रूपया को नैतिकता को, अवमूल्‍यन जारी
बिना साख बाजार, प्रदूषण कोडे कोनै
आंधी झखझोरै, चम्‍पा रजनीगन्‍धा नै
सिसक्‍या हार सिंगार, प्रदूषण कोडे कोनैं
मायड भाषा और देश की हिन्‍दी भाषा
हिगंलिश बणगी यार, प्रदूषण कोडे कोनैं
चक्रवात मौसम का तो, म्‍हे सह भी लेता
दिल  का गर्दगुबार, प्रदूषण कोडे कोनैं

किशोर पारीक 'किशोर'

मंगलवार, मई 04, 2010

झरता नेना नीर थम्या सब, गीत ग़ज़ल मुस्कान छै

ढूंढाड़ी कवि बुद्धि प्रकाश पारीक को किशोर पारीक की काव्यांजलि


मायड भाषा मोन हुई अब, हुयो घणो नुकसान छै
झरता नेना नीर थम्या सब, गीत ग़ज़ल  मुस्कान  छै
 दीप भुज्यो ढूंढाड़ी को तो, सगळा ही हैरान छै
जेपर म्हांको कविवर थां बिन,  दीख रह्यो वीरान छै
थाने म्हें आकाश कहूं , या छाया  हालो दरख कहूं
आँख्यां सूं हरदम झरवालो, कविवर थांने हरख कहूं
संसद छ चोपाल काव्य की, ढूंढाड़ी की शान छै
झरता नेना नीर थम्या सब, गीत ग़ज़ल मुस्कान छै

धरम जात  अर पात ना  देखी, शब्दां की गंगा बांटी
बरसां- बरसां याद करेली, मरुधर की थाने मांटी
थासू   सिख्योडा सब टाबर, माँ रह्या अहसान छै
झरता नेना नीर थम्या सब, गीत ग़ज़ल अर मुस्कान छै

उत्तर दक्षिण पूरब पच्छिम, साईकिल सूं थे नांप धरया
आई साल दिसंबर मांहि, कवियां का सम्मान करया
आँख्यां ओट हुया थे गुरुवर, बिलखे राजस्थान  छै
झरता नेना नीर थम्या सब, गीत ग़ज़ल मुस्कान छै

शब्दां ने ले जांवा  आगे, थांका पूर्णविराम सूं
दयो थे आसिरवाद घणेरो, आज सुराग का धाम सूं
फेरूँ बनसी यांम  सूं ही, तुलसी अर रसखान   छै
झरता नेना नीर थम्या सब, गीत ग़ज़ल मुस्कान छै

किशोर पारीक " किशोर"