किशोर पारीक "किशोर"

किशोर पारीक "किशोर"

किशोर पारीक "किशोर" की कविताओं के ब्लोग में आपका स्वागत है।

किशोर पारीक 'किशोर' गुलाबी नगर, जयपुर के जाने माने कलमकार हैं ! किशोर पारीक 'किशोर' की काव्य चौपाल में आपका स्वागत है।



बुधवार, मार्च 31, 2010

आता है याद मुझको, गुजरा हुआ जमाना

आता है याद मुझको, गुजरा हुआ जमाना
जब दो टके में मिलता था, पेट भर के खाना
नदियाँ सी बह रही थी, घी दूध  की वतन में
दो-चार गाय भेंसे,  रहती थी हर सदन में
तिन्नाने की मलमल, चवन्नी का चोगाना
बस दो रूपये में , बनता था सूट  एक जनाना
उस वक्त डालडा  ने,  सूरत न थी दिखाई
इन खाक सूरतों  पर, न मुर्दनी थी छाई
बीमारियाँ न दिल की,  इतनी   बढ़ी हुईथी
न ही ये जवानियाँ  यूं, फीकी पड़ी हुई थी
महंगाई का न झगडा, न कम की कमी थी
इमान की  कमाई,   इज्जत की जिन्दगी थी
अब वक्त आ गयाहै, कुछ एसी बेबसी का
होता नहीं गुजरा, बस रोना   है उसी का
भारत का हाल   क्या है, ले देख आँख वाले
मरते हैं लोग भूके, है रोटियों के लाले
पैसे की कद्रो कीमत, मिटटी में मिल गयी है
घी दूध  की ये ताकत, चाय में घूल गगी है
घूमना ना फिरना, हाय पैसा कमाना
आता है याद मुझको, गुजरा हुआ जमाना

प्रीत के मुक्तक

लिख दिया मेने तुम्हारा,  नाम अपनें नाम पर 
भौर की पहली किरण से. झिलमिलाती शाम तक 
आ भी जाओ रागिनी बन, गीत की मेरी प्रिये 
ज्यों लुटाई राधिका ने, प्रीत अपने श्याम पर  
गुनगुनाता है सवेरा, खिलखिलाती   धूप है
होश खो बैठे रयो देखे, रंक है या भूप है 
चांदनी सा अक्स हो, कैसी मधुर मुस्कान हो
नयन तक झपकूं नहीं में, क्या तुम्हारा रूप है
मौन  मुझको लग रहा, मानस की ज्यों चोपाइयां 
नयन जैसे कह रहे हों, मीर की रुबाइयां 
मुस्कान अधरों की तुम्हारे, गीत गोविन्दम लगे 
बन भी जाओ मीत मेरे, तुम मेरी परछाइयां
जो हुआ अच्छा हुआ, कैसे हुआ ये क्या हुआ
खो गया था भीड़ में, पर प्यार से तुमने छुआ
डबडबाये  नैन सब कुछ, दे गए पल भर में यूँ
जिन्दगी भर मांगता, रब से रहा में ज्यो दुआ
बंद पलकें है मेरी पर दीखता आकर है
शब्द अधरों से उतर कर, हो रहे साकार है
फर्क अब पड़ता नहीं , धूपमे और छावं में
पूछता संसार से बोलो, यही काया प्यार है
मन  के भाव को अधरों तलक हम ला नहीं पाए
तन के चाव को तुमको, कभी दिखला नहीं पाए
हमारी आँख के मोती, ढुलककर कर आपसे कहते
नगमे प्यार के सरकार, हम तो गा नहीं पाए

मंगलवार, मार्च 30, 2010

मन मेरे, मन मेरे,मन मेरे, मन, क्यों करता इतना नर्तन

मन  मेरे, मन मेरे,मन मेरे, मन
क्यों    करता  इतना   नर्तन
कभी तरंगीत कभी हताशा, पल में तोला पल में माशा
पल में तो कटुता गह लेता, पल में पानी बीच बताशा
पहन सा भारी हो जाता, अगले ही शण तू कण 
मन मेरे, मन मेरे,मन मेरे, मन , क्यों करता इतना नर्तन

जितना भी में तुझको कसता, उतना तू उलझन में फंसता
व्रस्थी बिंदु सम गिरे धूलि में, अथवा गिरा पंक में धंसता
कंकर पत्थर छोड़ बीनना, उज्जवल मोती बन
मन मेरे, मन मेरे,मन मेरे, मन, क्यों करता इतना नर्तन

उड़े पहाड़ों की श्रेणी  में, कभी चंचला की वेणी में
लिया नहीं संगम में ग़ोता,  नहीं नहाया तिरवेनी में
कबीर की चादर हेरी ना, मीरां का मोहन
मन मेरे, मन मेरे,मन मेरे, मन, क्यों करता इतना नर्तन

मन दसकंदर  को जब जीता, तब विमुक्त शीतलता  सीता
सब ग्रंथों में यही लिखा है, यही कृष्ण अर्जुन की गीता
मनके आगे जो भी हारा, वही रावण और दशानन
मन मेरे, मन मेरे,मन मेरे, मन, क्यों करता इतना नर्तन

दृग मूंदे में ध्यान लगता, मुझे छोड़  तू भागा जाता
स्थीर देह चेतना अस्थिर, जाने कहाँ कहाँ भरमाता
जड़ता तुझसे  लिपटी पगले, बन जा तू चेतन
 मन मेरे, मन मेरे,मन मेरे, मन, क्यों करता इतना नर्तन

मन कुल दीपक मन कुलघाती,मन है दूल्हा आप बाराती
मन ही सीधी -साधी गैया, मन ही है ऐरावत हाथी
मन मेनिज प्रतिबिम्ब देखले, मन अपना  दर्पण
मन मेरे, मन मेरे,मन मेरे, मन, क्यों करता इतना नर्तन

     

सोमवार, मार्च 29, 2010

अब मन किसके आगे खोले, इन घावों को कौन टटोले

अब मन किसके आगे खोले, इन घावों को कौन टटोले
निकली पांख उड़ गए पांखी, ले परवाजें होले-होले

तिनका तिनका नीड़ बनाया,
शायद यह कुदरत की माया
कोई बंधन कम न आया
विकसित कुछ अरमान हुए क्या
बन बैठे वो उड़न खटोले
अब मन किसके आगे खोले, इन घावों को कौन टटोले
निकली पांख उड़ गए पांखी, ले परवाजें होले-होले

टुकुर टुकुर तकते है राहें
अब भी आयें, अब भी आयें
नब को तकती थकी निगाहें
भूल गए घर देश ठिकाना
निकले बहुत  गज़ब के गोले
अब मन किसके आगे खोले, इन घावों को कौन टटोले

निकली पांख उड़ गए पांखी, ले परवाजें होले-होले
इन दर्दों को पीते पीते
यादों की जागीरें जीते
फिर भी हैं रीते के रीते
हम आपनी ममता से कहते
तुम भी बदलो अपने चोलें
अब मन किसके आगे खोले, इन घावों को कौन टटोले
निकली पांख उड़ गए पांखी, ले परवाजें होले-होले

रह रह कर झरते हैं नैना
दिल के टुकड़ों तुम खुश रहना
बाकी क्या तुमसे  कुछ कहना
जाने कब हम सूखे पत्ते
तेज हवा के संग में होले
अब मन किसके आगे खोले, इन घावों को कौन टटोले
निकली पांख उड़ गए पांखी, ले परवाजें होले-होले

रविवार, मार्च 28, 2010

होली पर दोहे

होली पर दोहे
गुल तितली से यों कहे, कैसे खेलूँ फाग
भ्रमरों ने की ज्यादती, लूटा सभी पराग

हीरा पन्ना दिल हुआ , तन जैसे पुखराज
नैना नीलम दे रह, नवरतनी अंदाज

देख रूप उनका हुआ, मैं होली पर दंग  
चेतन से मैं जड़ हुआ, माँ में बजी मृदंग

तट ने पूछा दूर से, टापू क्या है बात
जातीं लहरें दे गयी, चुम्बन की सौगात

प्रियतम के संकेत पर,ज्यों ही खोला द्वार
जाना कुछ ही देर में, महंगी थी मनुहार

काज़ल बोला आँख से, तुम हो पानीदार
मेरी सांगत कर बनो, तीखी कुटिल कटार

गली गरारे गोरियां, नहीं गोप नहीं फाग
गीतों में झरता न अब, पहले सा अनुराग

कृतिकार  और लेखनी, कव्यलोकी मंच
गीत ग़ज़ल ले दोड़ते, शब्दों के सरपंच


  

काव्‍यालोक: खोया बचपन कैसे लोटे, मित्र पुराने छोटे-छोटे

काव्‍यालोक: खोया बचपन कैसे लोटे, मित्र पुराने छोटे-छोटे

खोया बचपन कैसे लोटे, मित्र पुराने छोटे-छोटे

खोया बचपन कैसे लोटे, मित्र पुराने छोटे-छोटे
यादों की पुरवाई लाये, सावन में झूलों के झोटें

चंदामामा से बतियाना,
धमा चोकड़ी शोर मचाना
माँ के आँचल में छुप जाना
शेतानी पर पापा भरते,
बगल हमारे गजब चिकोटे
खोया बचपन कैसे लोटे, मित्र पुराने छोटे-छोटे
यादों की पुरवाई लाये, सावन में झूलों के झोटें

धरती,अम्बर, नदिया,पानी
परियां, तितली,राजा-रानी,
मीठी नींद सुलाती नानी
रंग बिरंगी, सतरंगी हम
पतंग उड़ाते जा परकोटे
खोया बचपन कैसे लोटे, मित्र पुराने छोटे-छोटे
यादों की पुरवाई लाये, सावन में झूलों के झोटें
भाता जादू खेल मदारी
नहीं सुहाता बस्ता भारी
पढना तो लगता लाचारी
हर इच्छा पूरी होती थी
घर में रहे भले हो टोटे
खोया बचपन कैसे लोटे, मित्र पुराने छोटे-छोटे
यादों की पुरवाई लाये, सावन में झूलों के झोटें
दोडाते कागज़ की नैया
प्यारी लगती गया मैया
हमे जगती रोज चिरैया
रह-रह कर झरते है नैना
कितनी यादें हमें कचोटे
खोया बचपन कैसे लोटे, मित्र पुराने छोटे-छोटे
यादों की पुरवाई लाये, सावन में झूलों के झोटें

देशभक्ति कुछ मुक्तक

जिसने दी है जान देश हित, उनका वंदन और नमन
जिसने रखी शान देश की, उनका करते अभिनन्दन 
फँसी  के   फंदे चूमे, सीने पर गोली  खाई
भारत माँ के वीर सपूतों, तुमको वंदन और नमन
गाइये तुम गीत बंधू , मीत प्रीत प्राण  हो
छेडिये   संगीत बंधू, सात सुर की तांन हो
देश मांगे जब, लहू तो भूल जाएँ प्यार-वार
दिल में जज्बा मात्रभू का, जय घोष हिंदुस्तान हो 
माँ भारती सपनो में आयी, दीखती अधीर थी
अपनों से मिली चोट की, मुख पे उसके पीर थी
मुझे लूटते थे परदेशी, अब घर वाले नोच रहे
पुत्र बता में जिसे चाहती क्या वो यह तस्वीर थी

शनिवार, मार्च 27, 2010

सूर्य हो प्रचंड नभ, आग बरसाता रहे



गर्मी में सेनिक

सूर्य हो प्रचंड नभ, आग बरसाता रहे
धूल चक्रवात रहे, धरा पर चढ़ा हुआ
रेत पारावार में भुने, जाते है जैसे प्राण
जैसे अन्न भुने तप्त, भाड़ में पड़ा हुआ
नेह की उमंग, प्रिय संग भूल राग रंग
देश की सुरक्षा में, किशोर तू अड़ा हुआ
शत्रु हेतु कल, ये मुकुट भारती के भाल
धेर्यवान लाल, तेरे बल पे जड़ा हुआ

गर्मी में मजदूर

झरनों से झरता है ,स्वेद पूरी काया से
सूर्य का प्रचंड तेज, झुलसाये जाता है
जेठ का महिना, भारी लगता है जीना
डामर की सड़कों को, पिघलाए जाता है
हम तो जनाब, ऐसी कूलर में बैठते हैं
दिहाड़ी मजूर का तो, मजूरी से नाता है
मजूरी नहीं तो, पेट परिवार जलता है
मजूरी मिले तो, धूप ताप सह पता है

शुक्रवार, मार्च 26, 2010

खुशबु कैसे महके मेरे गीतों में

खुशबु कैसे महके मेरे गीतों में
मैं कागज़ पर आग कलम से बोता हूँ
लिखता हूँ मैं दर्द जमाने के यारों
लिखता तो पीछे हूँ पहले रोता हूँ

ठंडी रातें बिता रहे फुटपाथों पर
मेरे शब्द चित्र उनको सहलायेंगे
पोंछ सके गर आंसू उनकी आँखों के
तबही सच्चे नगमे गीत कहायेंगे
कितने भी तूफान डराए धमकाये
ले पतवारे खड़ा साथ में होता हूँ
मैं कागज़ पर आग कलम से बोता हूँ

अलंकर छंदों की भाषा, क्या जानू
उपमा नवरस स्लेश भाव क्या होते है
मुझको तो बस दर्द दिखाई देता है
मैं जनमानस के क्रंदन का स्रोत हूँ
मैं कागज़ पर आग कलम से बोता हूँ

कदम बढ़ाते मात्रभूमि की रक्षा में
मेरी कलम नमन करती उन वीरों का
जो दुश्मन को धुल छठा दे छन भर में
वंदन करती कलम उन्ही शमशीरों का
विजय पताका लिए लोटता जब रण से
शब्द सुमन के हार अनेक पिरोता हूँ
मैं कागज़ पर आग कलम से बोता हूँ

जो पापी अन्यायी है अत्याचारी है
मेरी कलम सबक उनको सिखलाएगी
भारत माँ की छाती में जो घाव करे
कलम यही ओकात उन्हें बतलाएगी
किन्तु शहीदों के अति पावन चरणों को
शब्द अश्रु के गंगा जल से धोता हूँ
में कागज़ पर आग कलम से बोता हूँ
खुशबु कैसे महके मेरे गीतों में
मैं कागज़ पर आग कलम से बोता हूँ
लिखता हूँ मैं दर्द जमाने के यारों
लिखता तो पीछे हूँ पहले रोता हूँ







गुरुवार, मार्च 25, 2010

नेनों ने किया कमाल, सजनियाँ मुस्काई, होली में हुआ निहाल, बजी मन शहनाई !

नेनों ने किया कमाल, सजनियाँ मुस्काई,
होली में हुआ निहाल, बजी मन शहनाई !
रूप की दमक जैसे, हीरे की चमक जैसे,
कुंतल से छन -छन चांदनी फुआर हो
लोचन कटार धार, करे यार ऐसी मार,
बींधती करेजवा को, हुई आर- पार हो
कोई सी आवारा लटें, डोलती कपोलन पे,
चूम आचमन करे, फल रसदार हो
गोरियाँ लजाई, मुख अंगूरी दबाई,
मानो बिजुरी गिराई, लगा प्रीत की खुमार हो
सेनों से किया सवाल, साथ में अंगड़ाई ,
होली में हुआ निहाल, बजी मन शहनाई

एक एक पल मुझे साल के सामान लगे ,
कटी कैसे मेरी यार, एक वो विभावरी
प्रीत रोग हुआ नया, नींद उडी चेन गया,
में तो हुआ बावरा सा,संग वो भी बावरी
कल्पना में रही साथ, चंद्रमुखी उस रात,
याद आती रही मुझे ढेर सारी शायरी
बार बार कोंधती थी, दामनी हिये में मेरे,
चांदनी सुखद लगी शीत में जो तावरी
ये कैसा मचा बबाल , याद अक्षर ढाई,
होली में हुआ निहाल, बजी मन शहनाई


प्रीत की मली गुलाल, गोरिया के दोनों गाल
पिच्चकारी रंग लाल , लगी अंग अंग के
सर र र , सर र र, कामनी के अर र र र
टूट गए तंग , उस मोहनी पतंग के
लगा थम जाये घडी,बिन पिए ऐसी छड़ी
सुरताल बज उठे , हिये की मृदंग के
गमकते जैसे हो गए सजीव मित्र
कैसे रचु चित्र मैं, विचित्र से प्रसंग के
मैं हो गया माला मॉल , छबीली इतराई
नेनों ने किया कमाल, सजनियाँ मुस्काई,
होली में हुआ निहाल, बजी मन शहनाई

मंगलवार, मार्च 23, 2010

तरह तरह के स्वांग रचाते ये बाबा, गिरगिट को भी परे बिठाते ये बाबा

तरह तरह के स्वांग रचाते ये बाबा,
गिरगिट को भी परे बिठाते ये बाबा
राम नाम पर दम कमाते ये बाबा
तिरवेनी मेली कर आते ये बाबा !

उजला इनका वेश, चरितर काला है
दिन में इनके हाथ, कमंडल माला है
निश में प्याला, बाला है, मधु शाला है
मदनोत्सव हर रोज, मनाते ये बाबा,

तरह तरह के स्वांग रचाते ये बाबा,

नाम योग का, किन्तु भोग में भरमाना
रब से पब तक, का रखते है याराना
तकिया तोशक, साकी संग पीना खाना
इन्द्र अखाडा नित्य सजाते ये बाबा !
तरह तरह के स्वांग रचाते ये बाबा,

उपकारी ये नही, बहुत है अपकारी
ये विषधर है, मणिधारी, इच्छाधारी,
ये कुंठित अति अर्थ कम के व्यापारी
धर्म के बदले, पाप कमाते ये बाबा !
तरह तरह के स्वांग रचाते ये बाबा,

ये तो अपने बुड्डों के भी बापू हैं
परिग्राही है छदम लुटेरे डाकू हैं
मुख से बोले राम, बगल में डाकू हैं
बातों में बेन्कुंत पढ़ाते ये बाबा !
तरह तरह के स्वांग रचाते ये बाबा,

मत पालो इनके चक्कर में तुम पंगा
मन चंगा तो, है कठोती में गंगा
इनसे भला "किशोरे" गली का भिखमंगा
लाखों हड़प भभूत, टिकाते ये बाबा
तरह तरह के स्वांग रचाते ये बाबा,

तरह तरह के स्वांग रचाते ये बाबा,
गिरगिट को भी परे बिठाते ये बाबा
राम नाम पर दाम कमाते ये बाबा
तिरवेनी मेली कर आते ये बाबा !




मंगलवार, अक्टूबर 13, 2009

गंगा को अविरल बहने दो, जमना को अविरल बहने दो


गंगा को गंगा को अविरल बहने दो, जमना को अविरल बहने दो
मत छेडो इसकी धारा को, उज्ज्वलता रहने दो
गंगा को अविरल बहने दो, जमना को अविरल बहने दो
koi
जन्नत से जब उतरी गंगा माँ पावनता की थी मूरत
कल- कल करती इसकी लंहरे, सचमुच में थी शीतल अमृत
गंगाधर शिव ने जटा खोल, तब इसका वेग संभाला था
इतराती, इठलाती गंगा ने, स्वर्ग यहीं रच डाला था
सब लिखा शाश्वत ग्रंथो में, दुनिया जो कहती कहने दो
गंगा को अविरल बहने दो, जमना को अविरल बहने दो
ये पाप नाशनी है गंगा, ये रोग नाशनी है गंगा
ये मोक्ष दायिनी है गंगा, ये पुण्य दायिनी है गंगा
घर घर में पुजता गंगा जल, ये स्नेह दायिनी है गंगा
गंगा-जमनी तहजीबों , संवाहन करती है गंगा
अंधा, लालच, स्वारथ छोड़ो, कुछ निर्मलता के गहने दो
गंगा को अविरल बहने दो, जमना को अविरल बहने d
अब इसके बेटों ने देखो, कैसी मचाई है
लोरी गाती थी जो गंगा, वो क्रन्दन कर चिल्लाई है
रूनझुन पायल अब ना बाजे, पनघट पै ना दिखे बाला
मुल्ला पण्डित और नेता ने कितना ही शोषण कर डाला
यारों मत बांटो घाटों को, तट पर अच्छाई रहने दो
गंगा को अविरल बहने दो, जमना को अविरल बहने दो
उजले तन पर हमने खोले, कितने भीषण विष के नाले
सीवरेजो का भी मुह खोला , औधोगिक कचरे भी डाले
आने वर्षो में जब, सारी खुशिया बह जायेगी
भावी पीढी ताने देगी सूखी, गंगा रह जायेगी
सीमाए सब पर हुई , अब और परीक्षा रहने दो
गंगा को अविरल बहने दो, जमना को अविरल बहने दो
मुझको माँ कहने वालों पे, असर नही है रोने का
मेरा काम बचा है केवल, इनकी लाशे ढोने का
में हूँ एक , पाप अरब का , तर्पण ना कर पाउंगी
मेरा तर्पण कोट करेगा, बेटा जब मर जाउंगी
मृत्यु शैया पैर लेती हूँ, अन्तिम स्वांसे लेने दो
गंगा को अविरल बहने दो, जमना को अविरल बहने दो

गुरुवार, अगस्त 27, 2009

जागो ब्राह्मण जागो जागो भगवान परशुराम जयन्‍ती के अवसर पर गीत

गीत
धरती रथ जिसका चार वेद, जिसके घोड़ों के स्‍यंदन है
जो क्रांतिदूत, जमदग्‍नि पूत, उस ब्राह्मण का अभिनंदन है
सिर जटा जूट, साहस अटूट, रू रू नामक मृग की मृगछाला
इक्‍कीस बार जिसने धरणी को, वीर विहीन बना डाला
कुरूक्षेत्र धरा पर बाँध बाँध , अनगिनती बैरी काटे थे
जो पाँच सरोवर रीते थे, उसको अरि के शोणित से पाटे थे
है हय अर्जुन के सहस पुत्र, अपने ही हाथों मारे थे
उस शोर्यवान के आगे सब, अत्‍याचारी मिल हारे थे
उस वीर विप्र ने समय नब्‍ज को, सही समय पर जाना था
जब नाक तलक पानी आया, तब अपना फरसा ताना था
अवतारी के चरणों अर्पित, शब्‍दों को केसर चन्‍दन हैं
जो क्रांतिदूत, जमदग्‍नि पूत, उस ब्राह्मण का अभिनंदन है

जब परशु उठा था परशुराम को, सन्‍नाटा सा छाया था
भय बिन प्रीत नहीं होती, सिद्धान्त समझ में आया था
हम ऋषियों की संतानें हैं, ऊँचे उठने की ठाने हम
अपने पुरखों के कर्मयोग, प्रज्ञा को भी पहचाने हम
अपना एकत्‍व परशु जाने, अपना गत गौरव याद करें
बेदर्द जहां पर हो हाकिम, तब क्‍यों फिजूल फरियाद करें
हे विप्र उठो अँगड़ाई लो, चाणक्‍य सरिस बन कर आओ
ज्ञान ध्‍यान विज्ञान पढो, दुनिया पर फिर से छा जाओ
हमको अंगुलि से बता रहा, विस्‍तृत पथ वह भृगु नंदन है
जो क्रांतिदूत, जमदग्‍नि पूत, उस ब्राह्मण का अभिनंदन है

जिसके हाथों में बल होता, जग को तो वही चलाते हैं
दुनियां में वे ही पूजित हैं, उनके ही नगमें गाते हैं
जागो ब्राह्मण जागो जागो, अपने वर्णोतम को जानो
पर मरीचिका में मत भटको, तुम वर्तमान का पहचानो
जजमानी के दिन बीत गए, जजमानों ने कसली अंटी
अपनी संस्‍कृति पर निष्‍ठा पर, खतरे की आज बजी घंटी
ब्राह्मण के तो अस्‍तित्‍व तलक पर, घोर घटा मंडराई है
अब तिलक जनेऊ चोटी औ, मर्यादा पर बन आई है
ब्राह्मण के धर आज विकट, रोजी रोटी का क्रंदन है
जो क्रांतिदूत, जमदग्‍नि पूत, उस ब्राह्मण का अभिनंदन है

हे शारदे हमें तो यही दान चाहिये

धन-धान चाहिये ना सम्‍मान चाहिये
हे शारदे हमें तो यही दान चाहिये
देना है तो भरदेना अल्‍फाज में ताकत
फिर हाथ में ना तीर ना कमान चाहिये

लेखनी में शारदे मां, जान चाहिये
अशआर की तलवान में भी सान चाहिये
बजता रहे मां ज्ञान का और ध्‍यान का डंका
मुक्तक

मैं तो हर बार कहूँगा, ये आजादी मेली है

अपने को साज बताते हुवे शर्म आती है,
खुद को आवाज बताते हुवे शर्म आती है
जिस मुल्‍क में इंसान भूखा हो मेरे दोस्‍त
उस मुल्‍क को आवाज बताते हुवे शर्म आती है

जब तक भूखा सोये बचपन, जवानी ढूँढे रोजी को
लाश उढाने को न कपड़ा, बेबस फैलाये झोली को
पुलिस द्वारा स्वयं फ़रियादी, लूटे खसोटे जाते हों
निर्दोषी जेलों में तड़फे, हत्‍यारे फांसी से बच जाते हों
इंसाफ जहां का हो झूठा, और भ्रष्ट प्रशासन हो सारा
झूठी शिक्षा की मार ने, हर युवक को बेमौत मारा
जहां भूकी माताओं ने निज बेटों की जाने लेली है
मैं तो हर बार कहूँगा, ये आजादी मेली है

छात्र बसों को जला रहे, पुलिस निहारे जाती है
मैं पूछ रहा हूं क्‍या ये आजादी कहाती है
शिक्षा मन्‍दिर बच ना पाये राजनीति की चाल से
हर आँगन प्रांगण पींडीत हे घेरा बन्दी हड़ताल से
आजादी का वीर शिवा, सत्‍ता दुश्‍मन को सौंप रहा
भामा शाह धन की ही खातिर राणा के चाकू धोप रहा
इस मुल्‍क की पद्मिनी ही खिलजी से जाकर बोल रही
भरी सभा में आज स्‍वयं ही द्रोपती आँचल खोल रही
रोजाना फांसी पर लटक रही यह दुल्‍हन नई नवेली है
मैं तो हर बार कहूँगा, ये आजादी मेली है

जहां का ईश्‍वर अल्लाह ही आपस में लड़ जायेगा
क्‍या वों अभागा मुल्‍क देश फिर भी आजाद कहायेगा
गांधी का सपना टूट गया नेहरू की आशा बिखर गई
शासन तंत्र नहीं बदला सत्ता पर सत्ता बदल गई
समाजवाद का देकर नारा वोट मांग लजाते हें
स्‍वयं पहले और समाज बाद का, सिद्धांत यहां चलाते है
जनता के चूसे पैसे करली खड़ी हवेली है
मैं तो हर बार कहूँगा, ये आजादी मेली है

हिन्‍दी दिवस पर - अपनी हिन्‍दी । i


अपनी हिन्‍दी कुछ लोगों का, क्यों लगती बैगानी सी
हिन्‍द देश में हिन्‍दी दासी, अगरेजी पटरानी सी
मानव तन देकर वाणी दी, ईश्वर ने उपकार किया
देवनागरी लिपि देकर, फिर भाषा का उपहार दिया
घिस घिस कर मां की घूटी संग हिन्‍दी का अनुपान किया
जिसमें रोये और हंसे हम, सोचा समझा ध्‍यान किया
भाषायें है रंग रंगीली, भाषाओं के वंश यहाँ
प्राकृत पाली सौर सैनी है, संस्कृत है अपभ्रंश यहाँ
भाषाओं के बाग़ यहां पर अद्भुत और विहंगम हैं
भाषाओं की धाराऐं है और त्रिवेणी संगम है
भाषा संगम में है हिन्‍दी गंगाजी के पानी सी
अपनी हिन्‍दी कुछ लोगों का, क्यों लगती बैगानी सी

समवेत गान की अद्भुत क्षमता इस हिन्दी भाषा में है
सात लाख शब्‍दों की ताकत, भी हिन्‍दी भाषा में है
विकसित राष्‍ट्र बनाने की जिसमें थोड़ी अभिलाषा है
जन जन को जोड़े आपस में, ऐसी हिन्‍दी भाषा है
शोषक की भाषा को पकड़े रखना तो दुखदायक है
मैकाले की रूह दासता का ही तो परिचायक है
जिसकी मायड़ भाषा समझी जाती जो बेचारी है
राष्‍ट्र कोनसा दुनियां में वों, गौरव का अधिकारी है
अँग्रेज़ी क्यों लगती उनको, लन्‍दन की महारानी सी
अपनी हिन्‍दी कुछ लोगों का, क्यों लगती बैगानी सी
मींरा से उसके नटनागर हिन्‍दी में बतलाते थे
रसखान सूर कान्हा को हिन्दी में तान सुनाते थे
और कबीरा ने हिन्दी की साखी में जो बात कही
तुलसी के मानस से जमकर हिन्दी की रसदार बही
दिनकर पन्‍थ महादेवी ने हिन्‍दी का सरसाया था
और निराला ने हिन्दी में ही साहित्य रचाया था
हिन्दी के मंत्रों से ही तो, राष्‍ट्र चेतना आयी थी
अँग्रेज़ों को भगा देश से, हमने आजादी पायी थी
उस हिन्दी का मान नहीं हैं, मुझको है हैरानी सी
अपनी हिन्‍दी कुछ लोगों का, क्यों लगती बैगानी सी

कहने को तो हिन्‍दी में ही सारे विधि विधान है
मान दे रहा इसको देखो अपना संविधान है
फिर भी सिसक रही हिन्‍दी क्‍यों, अपने भारत देश में
बैठे हैं कुछ गोरे अब भी, अपनों के परिवेश में
एक दिवस हिन्दी का केवल, भला नहीं हो पायेगा
जब तक पूरा देश, ह्रदय से इसे नहीं अपनायेगा
माना विश्व संवादों हेतु अन्‍य भाषाऐं धूरी है
हिन्दी को मां माना है, तो सेवा भी जरूरी है
हिन्दी दवों की वाणी है, रानी है महारानी सी
अपनी हिन्‍दी कुछ लोगों का, क्यों लगती बैगानी सी

गीत

फेकिये आरक्षण के झुनझुने बेसाखियों को

सदियों से जोतियों में छोटी सी दरार थी जो
वही अब फैल गई, खाई जैसी हो गई
अगडों के तगड़ों के, पिछडों के झगड़ों में
देश की छबीली छवि, भाई कैसी हो गई
मंडल कमंडल से वोट बैक बन रहे
नेताओं की चाँदी है, कमाई कैसी हो गई
संसद में गूँगे बहरे, बापू तेरे बंदरों की
खोपड़ी सदेह सब मलाई, में ही खो गई

गूदड़ी के लालों का, ज्ञान जब व्‍यर्थ होगा
योग्‍यता और श्रेष्‍ठता को, राष्‍ट्र, ठुकरायेगा
तो ए पी जे कलाम, तेरा दो हजार बीस तक का
सपना अधूरा का, अधूरा रह जायेगा
समता के न्‍याय की धज्‍जियां गर यों ही उडी
प्रतिभा पलायन फिर कैसे रुक पायेगा
पढे लिखे युवकों को, रोजगार होगा नहीं

दीजिये आरक्षण तो प्राथमिक शिक्षा में दो
खूब पढवाइये और काबिल बनाइये
फेकिये आरक्षण के झुनझुने बेसाखियों को
योग्‍यता का माप दण्ड सबपे लगाइये
त्‍याग दीजे विष भरी, रेबडियां बांटना
आत्‍म विश्‍वास कुछ इनमें जगाइये
रंगे सियारों मत तोडो, मेरा देश तुम
भाइयों को भाइयों से मत लडवाइये

कवित्त

बिन फेरे हम तेरे

पशु हार्ट अटेक से नहीं मरते
क्‍यों कि बो शादी नहीं करते
क्‍या आदमी उससे भी गया गुजरा हैं
शादी तो साक्षात दासता का पिंजरा हैं
महाराष्‍ट्र में लिव इन रिलेशन ने,
संबंधों पर मोहर लगाई हैं
बल्लियों उछल रहें हैं लाखों कुँवारे
यह बात उन्हें बहुत पसंद आई हे1
आदमी कुंवारा पैदा हुवा था,
कुंवारा ही जिये, कुँवारा ही मरे

जहां कही स्वादिष्ट चारा देखे,
वहीं चरे
अब भविष्‍य में शादी की क्‍या गरज
क्‍यू बिगड़ावे अपनी विगत
अब अनेक बुराइयों का होगा
दी एंण्‍ड
क्‍यों कि ना वाइफ होगी,
ना हसबेण्‍ड
पति, पत्‍नी और वो का चक्‍कर भी
दूर होगा ना लड़की मजबूर होगी
ना लड़का मजबूर होगा
लाफटर लतीफ़ों में कैसे
पत्नी को कोसेगें
कवि गीतों में कैसे
हास्‍य परोसेगें
घर घर सियासत की तरह
गठ बंधन होंगे
सत्‍ता सुख की तर्ज पर
गृह सुख मिल बांट खायेंगे
क्लेश हुवा तो फिर
अलग अलग हो जायेगें
जब मूढ़ हुवा तो
बिन फेरे हम तेरे
नहीं तो तू तेरे मैं मेरे
सबसे ज्‍यादा चिंता तो हमें
एकता कपूर की सता रही हैं

वो पठठी तो ज्‍यादातर
सास बहू के सिरियल ही बना रही हैं
अब बन्‍द हो जायेगा
सालियों का जूते छिपाना
भूल जायेगें सलमान का वो गाना
दीदी तेरा देवर दीवाना
हाय राम कुडियों को डाले दाना
अब बेटी के बाप को
चौरासी लाख योनियों के
संचित पाप को
बेटे के बाप
अर्थात पीवने सांप
के चरणों में पग़डी रखने की
नौबत नहीं आयेगी
आँखें भी आंसू नहीं बरसायेंगीं
न ही बिटिया दहेज़ के लिये
जलाई जायेगीं
लिव इन रिलेशन हेतु
अब कुण्‍डली नहीं
सेलेरी स्लिप की बात होगी
सुहाग रात प्रत्‍येक रात होगी
पिछले प्रेम संबंधों का नहीं होगा फेरा
एक के मरते ही दूसरे की जिंदगी में
फिर आयेगा नया अँधेरा
नया फूल देखकर तितलियां
गुनगुनायेगी
सुन्‍दर घाट देखते ही मछलियां
आशियाना वहीं बसायेगी
मियां बीबी राज़ी तो क्‍या करेगा काजी
जैसे नारे होंगे बहुतेरे
या गाने होंगे बिन फेरे हम तेरे
सेक्‍स, रोमांस, मोज-मस्ति,
हम तो नये जमाने की बात करतें हैं
सांस्‍कृतिक पतन, चरित्र हनन,
ये आप किस जमाने की बात करतें हैं।

नेता जी का विवाह

नेता जी का विवाह
पक्‍की उमर के नेता ने
ब्याह रचाया
तो हमने
यह सवाल उठाया
हे मेरे देश की नाव के
तारनहार
इस उमर में
ये विवाह और प्‍यार
नेताजी ने भरी आह
कहने लगे
ये हैं मेरा है
मध्‍यावधि विवाह
आगे की बात सुन कर
हम रह गये दंग
कहने लगे
मेरा पहला विवाह
हो गया था भंग
किशोर पारीक"किशोर"