किशोर पारीक "किशोर"

किशोर पारीक "किशोर"

किशोर पारीक "किशोर" की कविताओं के ब्लोग में आपका स्वागत है।

किशोर पारीक 'किशोर' गुलाबी नगर, जयपुर के जाने माने कलमकार हैं ! किशोर पारीक 'किशोर' की काव्य चौपाल में आपका स्वागत है।



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गुरुवार, मार्च 31, 2011

सचिन का ध्यान, विश्व कप को दिलाएगा

यूवी का उफान, सहवाग का तूफ़ान
सचिन का ध्यान, विश्व कप को दिलाएगा
नाचे सारा देश, और झूमेगा परिवेश
मेच जीत कर फिर, जश्न मनाएगा
श्रीलंका फिल्डरों को, दोडायेंगे खूब ये
मुम्बई में शान से तिरंगा, फहराएंगा
कहता किशोर जोश, अपना पहाड जैसा
होली का उपहार देश, अनूठा ही पायेगा

किशोर पारीक "किशोर"

मंगलवार, अप्रैल 13, 2010

आज की कविता

आज की कविता
कोई रेड, कोई मेड, कविता से करे छेड़
कोई भोंपू, कोई सेड नाम धर आये है,
कविता के राष्ट्रीय मंच,छडे दोड़ दोड़
जोड़ जोड़ चुटीले से, चुटकुले सुनाये है
थाल अश्लीलता का, मॉल ड़ाल फुड़ता का
स्वाद भरे शब्दों के, भूरते बनाये है
जोकर बने है पर, जोक में भी दम   नहीं
सुकवि बेचारे शीश झुका सकुचाये है

जब से ये ठेकेदार, मंच को सजाने लगे
साहित्य पे स्यामत के मेघ मंडराए है
तालियाँ बटोरते है, गलियां सुनते खूब
दो दो अर्थ वाले संवाद भी जुटाए है
हरे हरे राम राम करे सभी साधू कवि
इनने तो हरे हरे नोट भी कमाए है
कविता में केंचिया, कटार सी चलाते  देख
केशव कबीर ने तो मुंह लटकाए है

कीजिये प्रहार तो, समाज की विसंगति पे
आपका प्रहार सत्य, रोतों को हंसायेगा
गुदगुदी भी करेगा,आनंद देगा व्याज रूप
दम चाहे नहीं मिले, दाद तो कमाएगा
श्रोता सदहोता निर्दोष और ईमानदार
जैसा भी परोस दोगे, वही तो वह खायेगा
कविभंड नहीं है, प्रचंड होता काव्य ओज
किया जो पाखंड कविमंडली लजाएगा

किशोर पारीक "किशोर"  

रविवार, अप्रैल 04, 2010

स्वाभिमान सो गया है, तेज कहीं खो गया है

स्वाभिमान  सो  गया है, तेज कहीं खो गया है
सिंह को सियार अब रोज धमकाएंगे 
आँख मूँद भीष्म बने, देश को चलने वाले
माँ भारती की लाज को, ये कैसे बचा पाएंगे
दुश्मनों   की आँख रही, देश के ललाट पर
प्रेम के तराने फिर भी गाते चले जायेंगें
संसद पे हमलों से, जूझेंगें जवान जब
कुर्सियों  के नीचे जाकर, ये छुप जायेंगें

किशोर पारीक" किशोर"

शुक्रवार, अप्रैल 02, 2010

पोथियाँ

जीवित किताबों में है, विद्यापति जयदेव
पुस्तकों में अमर, रहीम रसखान है
देह निज धर्म से, ही शेष होती एक दिन
स्मृति अशेष कृति, लेख पहिचान के
कवि कालीदास, व्यास, सूरदास, नाभादास
अष्टछाप कवियों  का, पोथियों में गान है
पुस्कें ही असल में साज़ माता शारदा का
राधिका का राग, कृष्ण- बांसुरी की तान  है



 पोथियों में वेद की.जो वाणी भगवान की है
ऋषियों के रचे, उपनिशध पुराण है
उतरा था आन के जेहन में पेगेम्बर के
पाक है कलाम, वही नाम कुरआन है
विष्णुगुप्त  में है, साम, दाम,दंड, भेद  
नीति स्म्रुति के ग्रन्थ, अपने संविधान है
ग्रन्थ का प्रकाश है, अकाल ओमकार रूप
गुरुग्रंथ साहिब, महान है, महान है

किशोर पारीक"किशोर" 


गाय की गुहार


गाय की गुहार
भटक रही गली-गली, पोलीथिन खाती-खाती 
   नदी नाले दूध के जो, पोथियों में बह गए   
 कट रही गाय आज, कमलों में झुण्ड-झुण्ड
गऊ प्रेम क्षेम सब,अंक मूँद सो गए
कैसे बने कोड अब, तीन सो दो दफा जैसा
नेता सरे संसद के, गूंगे बहरे हो गए
कृष्ण तू तो गोप था, गोपाल था, गोविन्द रहा
आज तेरे वंश के ही कंस जैसे हो गए
दूध, दही, घृत देय, जगत को पोसती है 
मानव संवारती है, रूप धरे मैया का 
गांव को ये अम्ब, स्वावलंब, उपहार देती 
बैल पतवार होता, खेत रुपी नैया का 
गोधन संपन्न कहा जाता, वही देश धन्य-धन्य
करें संम्मान आप, धेनु के चैरया का 
देवता तैतीस कोटि,रोम में रमे ही रहे
कैसा प्यार पाया मेरे, कुंवर कन्हैया का 
धोरी, लाल, घूमरी, सवत्स, कपिला के संग 
कैसा प्यार पाया, मेरे कन्हैया बलभैया का
वही भूमि वही गाय, प्राण भय डकराय
आर्तनाद करे जैसे हाय-हाय, दैया का
संविधान मांही आप, धारा एक जोड़ दीजे 
ख़ूनी जैसा हस्र होवे,  गाय के कटैया का 
छोड़ काम दोड़ पड़े , गाय की गुहार पर 
भैया प्राण बचे तभी, गोविन्द की गैया का 
किशोर पारीक" किशोर"
        

गुरुवार, अप्रैल 01, 2010

आरक्षण के कवित्त

सदियों  से जातियों में, छोटी सी  दरार थी जो
वही अब फैल गयी, खाई जैसी हो गयी
पिछड़ों में अगड़ों में, तगडों के झगड़ों में 
देश की छबीली छवि, भाई कैसी हो गयी 
मंडल कमंडल में,  वोट बैंक बन रहे 
नेताओं की चांदी है, कमाई कैसी हो गयी 
संसद में गूंगे बहरे, बापू तेरे बंदरों की 
खोपड़ी सदेह सब, मलाई में ही खो गयी 
गूदड़ी के लालों का, ज्ञान जब व्यर्थ होगा 
श्रेष्ठता और योग्यता, को रास्त्र ठुकराएगा 
ए पी जे कलम तेरा,  दो हज़ार बीस तक का
सपना अधूरा का अधूरा, रह जायेगा
समता के न्याय की, धज्जियाँ   गर यों ही उडी
प्रतिभा पलायन फिर, कैसे रूक पायेगा 
पढ़े लिखें  युवकों को, रजगार होगा नहीं 
  पेट भरने को, वो अपराधी हो जायेगा

,
दीजिये आरक्षण तो, प्राथमिक शिक्षा से दो 
खूब पढ़वाईये, और, काबिल  बनाईये 
फेंकिये आरक्षण के, झुनझुने बैसाखियों को 
योग्यता का मापदंड, सब पे लगाईये 
त्याग दीजे विष भारी, रेवड़ियाँ बाटना
आत्म विस्वास कुछ, इनमे जगाईये 
रंगे सियारों मत तोड़ो,  मेरेदेश को तुम 
भाईयों को भाईयों, से मत लडवाईये
किशोर पारीक "किशोर"     
  
   

शनिवार, मार्च 27, 2010

सूर्य हो प्रचंड नभ, आग बरसाता रहे



गर्मी में सेनिक

सूर्य हो प्रचंड नभ, आग बरसाता रहे
धूल चक्रवात रहे, धरा पर चढ़ा हुआ
रेत पारावार में भुने, जाते है जैसे प्राण
जैसे अन्न भुने तप्त, भाड़ में पड़ा हुआ
नेह की उमंग, प्रिय संग भूल राग रंग
देश की सुरक्षा में, किशोर तू अड़ा हुआ
शत्रु हेतु कल, ये मुकुट भारती के भाल
धेर्यवान लाल, तेरे बल पे जड़ा हुआ

गर्मी में मजदूर

झरनों से झरता है ,स्वेद पूरी काया से
सूर्य का प्रचंड तेज, झुलसाये जाता है
जेठ का महिना, भारी लगता है जीना
डामर की सड़कों को, पिघलाए जाता है
हम तो जनाब, ऐसी कूलर में बैठते हैं
दिहाड़ी मजूर का तो, मजूरी से नाता है
मजूरी नहीं तो, पेट परिवार जलता है
मजूरी मिले तो, धूप ताप सह पता है

गुरुवार, अगस्त 27, 2009

फेकिये आरक्षण के झुनझुने बेसाखियों को

सदियों से जोतियों में छोटी सी दरार थी जो
वही अब फैल गई, खाई जैसी हो गई
अगडों के तगड़ों के, पिछडों के झगड़ों में
देश की छबीली छवि, भाई कैसी हो गई
मंडल कमंडल से वोट बैक बन रहे
नेताओं की चाँदी है, कमाई कैसी हो गई
संसद में गूँगे बहरे, बापू तेरे बंदरों की
खोपड़ी सदेह सब मलाई, में ही खो गई

गूदड़ी के लालों का, ज्ञान जब व्‍यर्थ होगा
योग्‍यता और श्रेष्‍ठता को, राष्‍ट्र, ठुकरायेगा
तो ए पी जे कलाम, तेरा दो हजार बीस तक का
सपना अधूरा का, अधूरा रह जायेगा
समता के न्‍याय की धज्‍जियां गर यों ही उडी
प्रतिभा पलायन फिर कैसे रुक पायेगा
पढे लिखे युवकों को, रोजगार होगा नहीं

दीजिये आरक्षण तो प्राथमिक शिक्षा में दो
खूब पढवाइये और काबिल बनाइये
फेकिये आरक्षण के झुनझुने बेसाखियों को
योग्‍यता का माप दण्ड सबपे लगाइये
त्‍याग दीजे विष भरी, रेबडियां बांटना
आत्‍म विश्‍वास कुछ इनमें जगाइये
रंगे सियारों मत तोडो, मेरा देश तुम
भाइयों को भाइयों से मत लडवाइये

कवित्त

शुक्रवार, अगस्त 07, 2009

महाराणा प्रताप के सम्‍मान में

महाराणा प्रताप के सम्‍मान में
शब्‍दों में सीमित हैं भाषा, कैसे में गुणगान करुँ
दुनियां भर में चर्चा हैं महाराणा के अभियान की
जननी जन्‍मभूमि के खातिर, हँसते-हँसते कष्‍ट सहे
स्वाभिमान चेतक से तुलना, रामभक्‍त हनुमान की
हल्दिघाटी की माटी तो, हर माथे का चन्‍दन हैं
गूंज रही कण-कण में गाथा, वीरों के बलिदान की

गौरवमय, गरिमामय, मित्रों, हमको हैं इतिहास मिला 
 भारत मां की गोदी पायी,  तो रज राजस्‍थान की
किशोर पारीक" किशोर" कवित्त