किशोर पारीक "किशोर"
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किशोर पारीक 'किशोर' गुलाबी नगर, जयपुर के जाने माने कलमकार हैं ! किशोर पारीक 'किशोर' की काव्य चौपाल में आपका स्वागत है।
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शुक्रवार, जून 24, 2011
गुरुवार, मार्च 31, 2011
गुलाल अबीर का तिलक लगाने, हर घर जायेंगे !!
गीत सुनायेंगे रंगों के, फाग सजायेंगे !
इस होली पर मस्ती में, हम सब हर्षाएँगे !!
न पानी से होली का, त्यौहार मनाएंगे !
गुलाल अबीर का तिलक लगाने, हर घर जायेंगे !!
इस होली पर मस्ती में, हम सब हर्षाएँगे !!
न पानी से होली का, त्यौहार मनाएंगे !
गुलाल अबीर का तिलक लगाने, हर घर जायेंगे !!
मंगलवार, सितंबर 28, 2010
स्वर कोकिला लता मंगेशकर जी के ८१ वें जन्म दिन पर
स्वर कोकिला लता मंगेशकर जी के ८१ वें जन्म दिन पर
जियों हजारों साल लताजी,प्रभू की अनुपम रचना हो
सुनले गीत तुम्हारे मधुरम, जब दर्दों को हरना हो
बरसों में पैदा होती है,कोयल एक तुम्हारी सी
जिसका स्वर इतना मीठाहो, जों शहद का झरना हो
दो अक्षर का नाम नहीं है, सुर की पूरी दुनियां है
सृष्टी की नायब कृति है, गंगा जैसी दरिया है
कान्हा की वंशी की धुन, मीरा के इकतारे सी
सात सुरों में आप लताजी, फैलती स्वर लहरिया है
किशोर पारीक "किशोर"
जियों हजारों साल लताजी,प्रभू की अनुपम रचना होसुनले गीत तुम्हारे मधुरम, जब दर्दों को हरना हो
बरसों में पैदा होती है,कोयल एक तुम्हारी सी
जिसका स्वर इतना मीठाहो, जों शहद का झरना हो
दो अक्षर का नाम नहीं है, सुर की पूरी दुनियां है
सृष्टी की नायब कृति है, गंगा जैसी दरिया है
कान्हा की वंशी की धुन, मीरा के इकतारे सी
सात सुरों में आप लताजी, फैलती स्वर लहरिया है
किशोर पारीक "किशोर"
मंगलवार, सितंबर 21, 2010
इस धरती पर जो भी आया, वो बिलकुल अंजाना था
इस धरती पर जो भी आया, वो बिलकुल अंजाना था
धरती पर ही सीखा उसने, ढाई आखर गाना था
ढूढ़ रहा हूँ अजनबियों में , कोइ हो मेरा अपना
जिसको मैंने समझा अपना, वो सचमुच बेगाना था
कल से लेकर कल तक सारा, पल पल बीता बातों में
विश्वासों का घट था रीता, सावन की बरसातों में
इतराई राहे पगडंडी, हंसी ठिठोली कर कर के
प्यासी वधुए वापस लोटी, पनघट से जज्बातों में
सारा जग ही घर अपना है, सबको पाठ पढाया है
विश्व गुरु बनकर दुनिया को सच्चा ज्ञान कराया है उस भारत में जांत-पांत की,आरक्षण, जनगणना हो हे राम हमारे भारत को ये, कैसा दिन दिखलाया है
धरती पर ही सीखा उसने, ढाई आखर गाना था
ढूढ़ रहा हूँ अजनबियों में , कोइ हो मेरा अपना
जिसको मैंने समझा अपना, वो सचमुच बेगाना था
कल से लेकर कल तक सारा, पल पल बीता बातों में
विश्वासों का घट था रीता, सावन की बरसातों में
इतराई राहे पगडंडी, हंसी ठिठोली कर कर के
प्यासी वधुए वापस लोटी, पनघट से जज्बातों में
सारा जग ही घर अपना है, सबको पाठ पढाया है
विश्व गुरु बनकर दुनिया को सच्चा ज्ञान कराया है उस भारत में जांत-पांत की,आरक्षण, जनगणना हो हे राम हमारे भारत को ये, कैसा दिन दिखलाया है
किशोर पारीक "किशोर"
शनिवार, मई 15, 2010
लतीफे बज़्म में ना हो, कभी काबिज़ मेरे यारो
परिंदा कह गया हमको, खुदा हाफिज़ मेरे यारो
चमन में चह चहे कायम,रहे हरगिज़ मेरे यारो
हमारा फ़र्ज़ है महफिल में, केवल शायरी होवे
लतीफे बज़्म में ना हो, कभी काबिज़ मेरे यारो
चमन में चह चहे कायम,रहे हरगिज़ मेरे यारो
हमारा फ़र्ज़ है महफिल में, केवल शायरी होवे
लतीफे बज़्म में ना हो, कभी काबिज़ मेरे यारो
मंगलवार, अप्रैल 13, 2010
मुक्तक : तिरंगा
मुक्तक : तिरंगा
भारत की आत्मा का है, रूप यह तिरंगा
हमको सदा से लगता, अनूप यह तिरंगा
जब तक गगन में होंगे, सूरज चंदा तारे
तब तक रहेगा कायम, स्वरुप यह तिरंगा
लारा रहा है जग में, चितचोर यह तिरंगा
सैनिक के बाजुओं में, बन जोर यह तिरंगा
कश्मीर पे गड़ाई, दुश्मन ने अपनी नज़रें
उसकी धरा पे होगा, चहुँ और यह तिरंगा
किशोर पारीक " किशोर"
सोमवार, अप्रैल 12, 2010
मुक्तक : सरताज है हिमालय, कश्मीर नयनतारा
सरताज है हिमालय, कश्मीर नयनतारा
चरणों को धोये सागर, नहलाती गंगधारा
अवतार ओ पयम्बर, खेले धारा पे जिसके
ऐसा अतुल्य भारत, प्राणों से भी प्यारा !
सीरत रही है जिसकी, सद्भाव भाई चारा
बलिदान होके जिसको , वीरों ने है संवारा
उस देश को नमन है, जो मातृ भू हमारा
कुरबान उसपे होवें , गर वो करे इशारा !
किशोर पारीक'किशोरे"
चरणों को धोये सागर, नहलाती गंगधारा
अवतार ओ पयम्बर, खेले धारा पे जिसके
ऐसा अतुल्य भारत, प्राणों से भी प्यारा !
सीरत रही है जिसकी, सद्भाव भाई चारा
बलिदान होके जिसको , वीरों ने है संवारा
उस देश को नमन है, जो मातृ भू हमारा
कुरबान उसपे होवें , गर वो करे इशारा !
किशोर पारीक'किशोरे"
गुरुवार, अप्रैल 08, 2010
मुक्तक : अंग्रेजों के इंडिया को, भारत में कब बदलोगे
कलकत्ता, मद्रास, बंबई, बदले कितने नाम
शुद्र स्वार्थ के खातिर, हम सब करते ऐसे काम
अंग्रेजों के इंडिया को, भारत में कब बदलोगे
एक देश के दुनियां में, न देखे हैं दो नाम
किशोर पारीक"किशोर"
शुद्र स्वार्थ के खातिर, हम सब करते ऐसे काम
अंग्रेजों के इंडिया को, भारत में कब बदलोगे
एक देश के दुनियां में, न देखे हैं दो नाम
किशोर पारीक"किशोर"
शुक्रवार, अप्रैल 02, 2010
जन- जन के माँ की पीड़ा का, गायक मैं किशोर हूँ
मुक्तक
सोचता हूँ मैं लिखूं, कुछ चांदनी के रूप पर
मीत के संग प्रीत पर, योवन नहाती धूप पर
भूख नफरत देखकर , आवेश आता है
इसीलिए कविता में, पहले देश आता है
====
ना कोलाहल हूँ मैं यारों, सिसकी ना ही शोर हूँ
दर्द को सहलाने वाली, अँगुलियों की पोर हूँ
शब्द लिखें हैं जितने मैंने , धड़कन की हर स्वांस से
जन- जन के मन की पीड़ा का, गायक मैं किशोर हूँ
किशोर पारीक"किशोर"
सोचता हूँ मैं लिखूं, कुछ चांदनी के रूप पर
मीत के संग प्रीत पर, योवन नहाती धूप पर
भूख नफरत देखकर , आवेश आता है
इसीलिए कविता में, पहले देश आता है
====
ना कोलाहल हूँ मैं यारों, सिसकी ना ही शोर हूँ
दर्द को सहलाने वाली, अँगुलियों की पोर हूँ
शब्द लिखें हैं जितने मैंने , धड़कन की हर स्वांस से
जन- जन के मन की पीड़ा का, गायक मैं किशोर हूँ
किशोर पारीक"किशोर"
बुधवार, मार्च 31, 2010
प्रीत के मुक्तक
लिख दिया मेने तुम्हारा, नाम अपनें नाम पर
भौर की पहली किरण से. झिलमिलाती शाम तक
आ भी जाओ रागिनी बन, गीत की मेरी प्रिये
ज्यों लुटाई राधिका ने, प्रीत अपने श्याम पर

आ भी जाओ रागिनी बन, गीत की मेरी प्रिये
ज्यों लुटाई राधिका ने, प्रीत अपने श्याम पर
गुनगुनाता है सवेरा, खिलखिलाती धूप है
होश खो बैठे रयो देखे, रंक है या भूप है
चांदनी सा अक्स हो, कैसी मधुर मुस्कान हो
नयन तक झपकूं नहीं में, क्या तुम्हारा रूप है
मौन मुझको लग रहा, मानस की ज्यों चोपाइयां
नयन जैसे कह रहे हों, मीर की रुबाइयां
मुस्कान अधरों की तुम्हारे, गीत गोविन्दम लगे
बन भी जाओ मीत मेरे, तुम मेरी परछाइयां
जो हुआ अच्छा हुआ, कैसे हुआ ये क्या हुआ
खो गया था भीड़ में, पर प्यार से तुमने छुआ
डबडबाये नैन सब कुछ, दे गए पल भर में यूँ
जिन्दगी भर मांगता, रब से रहा में ज्यो दुआ
बंद पलकें है मेरी पर दीखता आकर है
शब्द अधरों से उतर कर, हो रहे साकार है
फर्क अब पड़ता नहीं , धूपमे और छावं में
पूछता संसार से बोलो, यही काया प्यार है
मन के भाव को अधरों तलक हम ला नहीं पाए
तन के चाव को तुमको, कभी दिखला नहीं पाए
हमारी आँख के मोती, ढुलककर कर आपसे कहते
नगमे प्यार के सरकार, हम तो गा नहीं पाए
रविवार, मार्च 28, 2010
देशभक्ति कुछ मुक्तक
जिसने दी है जान देश हित, उनका वंदन और नमन
जिसने रखी शान देश की, उनका करते अभिनन्दन
फँसी के फंदे चूमे, सीने पर गोली खाई
भारत माँ के वीर सपूतों, तुमको वंदन और नमन
गाइये तुम गीत बंधू , मीत प्रीत प्राण हो
छेडिये संगीत बंधू, सात सुर की तांन हो
देश मांगे जब, लहू तो भूल जाएँ प्यार-वार
दिल में जज्बा मात्रभू का, जय घोष हिंदुस्तान हो
देश मांगे जब, लहू तो भूल जाएँ प्यार-वार
दिल में जज्बा मात्रभू का, जय घोष हिंदुस्तान हो
माँ भारती सपनो में आयी, दीखती अधीर थी
अपनों से मिली चोट की, मुख पे उसके पीर थी
मुझे लूटते थे परदेशी, अब घर वाले नोच रहे
पुत्र बता में जिसे चाहती क्या वो यह तस्वीर थी
गुरुवार, अगस्त 27, 2009
हे शारदे हमें तो यही दान चाहिये
धन-धान चाहिये ना सम्मान चाहिये
हे शारदे हमें तो यही दान चाहिये
देना है तो भरदेना अल्फाज में ताकत
फिर हाथ में ना तीर ना कमान चाहिये
लेखनी में शारदे मां, जान चाहिये
अशआर की तलवान में भी सान चाहिये
बजता रहे मां ज्ञान का और ध्यान का डंका
मुक्तक
हे शारदे हमें तो यही दान चाहिये
देना है तो भरदेना अल्फाज में ताकत
फिर हाथ में ना तीर ना कमान चाहिये
लेखनी में शारदे मां, जान चाहिये
अशआर की तलवान में भी सान चाहिये
बजता रहे मां ज्ञान का और ध्यान का डंका
मुक्तक
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