किशोर पारीक "किशोर"

किशोर पारीक "किशोर"

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किशोर पारीक 'किशोर' गुलाबी नगर, जयपुर के जाने माने कलमकार हैं ! किशोर पारीक 'किशोर' की काव्य चौपाल में आपका स्वागत है।



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शुक्रवार, फ़रवरी 11, 2011

गूँगा-बहरा जग हुआ, कौन सुनेगा पीऱ?






किस कदर काटी अंधेरी रात, हमसे क्या छिपा है? चाँद, सूरज रोशनी लाएँ तुम्हारी जि़न्दगी में, इस कदर से शुभ कामनाएँ, हों फलित तुम्हारी जि़न्दगी में,ऐसी सुन्दर शुभकामना से भरी चतुष्पदी के साथ ही अपनी ताज़ा चतुष्पदियों व अपने विख्यात गीत” गा मेरी जि़दगी कुछ गा सुनाकर” वरिष्ट साहित्यकार प्रो. नन्द चतुर्वेदी ने “तनिमा “मासिक पत्र के त्रिदिवसीय डॉ. भँवर सुराणा स्मृति समारोह के दूसरे दिन आयोजित कविसम्मेलन को जीवन्त व यादगार बनाया।

श्री नन्द चतुर्वेदी के मंगल सानिध्य में नगर के बाहर से आमंत्रित शायर व कवियों ने मुक्तकों, दोहों, गीत और गज़लों की रसवर्षा से देर रात तक श्रोताओं को बाँधे रखा। कवि सम्मेलन का आगाज़ संचालन कर रहे जयपुर से आए कवि श्री किशोर पारीक किशोर ने माँ सरस्वती की वन्दना से किया। दिल्ली से आये युवा शायर अनस ख़्ाान ने अनेक गंभीर दोहे पेश कर श्रोताओं को अचंभित कर दिया। उन्होंने तनिमा की संपादक को अपनी कुछ पंक्तियाँ यूँ समर्पित की- कि ख्वाबों में जो देखी थी, ऐसी हर सुबह आये, सूरज से शफक टूटे, सितारों में बिखर जाये।बहुत देखें है अहले ज़र, बहुत देखी मसीहाई,जो आप आयें तो महिफल का अलग ही रंग ढ़ल जाये।ज़र्रा- ज़र्रा रोशन हो, इतनी ताब बढ़ जाये,बुरी नज़र जो तुमपे डाले, आँखों से पिघल जाये।। श्री अनस ने अपने उम्दा दोहों-जैसे,बदन छुपा कर क्या होगा, जग चरित नहीं मज़बूत। तालों के भी क्या बस में, जब कुण्डी जाये टूट।।अलग-अलग हैं सब के रस्ते, अलग-अलग है चाल।बगुला नापे अंबर को, कछुआ चाटे ताल।।बड़े शहर से अपनी दूरी रखिये मीलों-मील।

पीपाड़ सिटी-जोधपुर से आमंत्रित कवि श्री राम अकेला ने हास्य की ताज़ा फूलझडिय़ाँ छोड़ीं व अपना रंग जमाया। उन्होंने शुरूआत इन पंक्तियों से की कि कविता की सर्दी से बचना चाहो तो,तालियों की रज़ाई ओढ़ लीजिये।कुछ मुक्तक सुनाकर उन्होंने आखिर में श्रोताओं को मुक्तक सुनाया कि“सुहाना हर दिन होगा, सुहानी हर रात होगी, आपको जो पसंद हो, वही बात भी होगी,बिछड़ रहा हूँ दोस्तों इस उम्मीद से, जि़न्दा रहे तो फिर मुलाकात होगी।



जयपुर से आये कवि श्री चन्द्र प्रकाश चन्दर ने दोहे पेश कर अपना प्रभाव छोड़ा - गूँगा-बहरा जग हुआ, कौन सुनेगा पीऱ? गौशाला सूनी पड़ी, मधुशाला में भीड़। उनकी गज़ल- ख़्वाब देखा था दिल लगाने का, बग पता गुम है आशियाने का, जयपुर के ही मशहूर गीतकार श्री बनज कुमार बनज ने एक से बढ़ कर एक अनेक दोहे सुनाकर सभी की वाहवाही ली, जैसे -फूलों के संग रह रहा, मैं माटी का ढ़ेर, मुझमें भी बस जायेगी खुशबु देर-सबेर।एक अकेला कर रहा, सब के सारे काम,सब मिल कर ऐसा करो, वो करले आराम।

इन दोहों के साथ ही उनके द्वारा प्रस्तुत गीत चला चला मैं चला रात भर,चंदा को कांधे पे धर कर ने कवि सम्मेलन को ऊँचाइयाँ प्रदान की।



जयपुर की शायरा व कवयित्री श्रीमती शोभा चन्दर ने चन्द मुक्तकों से अपना काव्य पाठ शुरू किया। उन्होंने एक मनोहारी राजस्थानी छन्द सुनाकर खूब दाद लूटी धन्य धरा मेवाड़ री जन्म्या पूत अनेक,

लाखां पर भारी पड़ै, थारौ जायो एक। उनकी गज़ल- रंगीनियों को आहे रसा कौन दे गया? शहनाइयों में $गम की सदा कौन दे गया? एवं सुमधुर गीत -यूँ ना देखो मुझे तुम सजन प्यार से, गीत बन कोई अधरों से कह जाऊँगी। -ने सभी को लुभाया । जयपुर के ही श्री किशोर पारीक स्वाईन फलू पर आधारित हास्य रचना से सभी को गुदगुदाने में क़ामयाब रहे। उनका गीत हम भारत हैं दुनिया वालों हम से बात करो ने कविसम्मेलन में राष्ट्रभक्ति के स्वर बिखेरे। देश भक्ति के गीत गाने वाले वरिष्ट गीतकार चित्तौडग़ढ़ से आये श्री अब्दुल जब्बार ने चन्द मुक्तक व अशआ्र कहे व सभी को सोचने पर मज़बूर कर दिया। जैसे जीने दो हर बशर को ख़्ाुद भी जिया करो, तितली के परों तलक की हिफाज़त किया करो जैसे मुक्तक से अपना प्रभाव $कायम किया। उन्होंने आगे भी बेहतरीन अशआर ्कहे-जैसे कि- मंदिर-मस्जि़द बनाने से बनाने से बेहतर है, सी गरीब की बेटी को गोद ले लेना।उस शहर से उजाले कोसों दूर रहते हैं, जिस शहर में एकता और भाईचारा नहीं होता।उनका गाया राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत गीत -मत लूटो इस देश के जैसा दुनिया में कोई देश नहीं, न$फरत के बीज बोने को, ये आँगन ये देश नहीं, भी सभी को झूमने को मज़बूर कर गया।

बाँसवाड़ा से आमंत्रित मशहूर शायर ने अपने बेहतरीन $कलाम पेश कर के कवि सम्मेलन को शानदार बना दिया। उन्होंने सबसे पहले कुछ मिसरे तनिमा को नज़र किये- किहज़ारों बुलबुले उठ-उठ के मिट जाते हैं दरिया में,न मौंजें याद रखती हैं ना साहिल याद रखता है, मगर वो $कश्तियाँ जो टक्कर लेती हैं तूफ़ाँ से, उन्हीं को मुद्दतों हर साहिबे दिल याद करता है।उनकी पेश की गई-गुलशन में जो परिन्दा चहकता दिखाई दे, सैयाद का उसी पर निशाना दिखाई दे।बेटा नहीं है घर में अगर तो क्या, बेटी का $कद भी बेटे से ऊँचा दिखाई दे।ने सभी के दिलों पर दस्तक दी। वहीं उन्होंने अपनी दूसरी गज़ल-जो साज़े अहले सियासत से राग निकलेंगे-तो आस्तीनों से ज़हरीले नाग निकलेंगे, मुझे य$कीन है ये बहुरूपियों की बस्ती है-यहाँ पे हंस की सूरत में काग निकलेंगे। -को सुना कर सभी को सोचने पर मज़बूर किया। उनकी अगली $गज़ल-क्यँू होता नहीं कोई असर मेरी दुआ का ,क्या अब भी गुनहगार हूँ,मैं अपने ख़्ाुदा का?मज़बूर हो के बेच रहा हँू मैं ख़्ाून भी अपना, करना है इन्तज़ाम मुझे माँ की दवा का।मत कर गुरूर वक़्त अगरमेहरबान है, क्या जाने कब मिजाज़ बदल जाये हवा का? उन्होंने दिलकश तरन्नुम में पेश कर खू़ब दाद लूटी। जनाब मेहशर अफगानी की बेहतरीन गज़ल-उसके घर मैं गया सोचते- सोचते, वो भी मुझसे मिला सोचते-सोचतेहो गये मुब्तला हम तो इफलास में, भाइयों का भला सोचते-सोचते। ने तो श्रोताओं को मुकर्रर-मुकरर्र कहने को मज़बूर कर दिया।



बूँदी से आये अंगद दैनिक के संपादक-प्रकाशक श्री मदन मदिर ने अपनी आक्रामक तेवरों में ओजपूर्ण कविता -जि़न्दगी जगाओ रे गीत को सजाओ रे, ये सारे अंधियारे मिलकर हमलावर हैं, समता की किरणों को नौंच-नौंच डालेंगे, कै़द कर लिया चाँद-सूरज को, चाँदनी को ये पंजे लील-छील जायेंगे सुनाकर कविसम्मेलन में श्रोताओं को मौजूदा हालात व यथार्थ से रूबरू कराया। जयपुर से आमंत्रित राजस्थान पत्रिका के समाचार समन्वयक श्री दिनेश ठाकुर ने अपनी बेहतरीन गजलों से कविसम्मेलन में वाहवाही पाई। उन्होंने गज़ल-कभी आँसू कभी ख़्वाबों के धारे टूट जाते हैं, ज़रा सी बात में क्या-क्या नज़ारे छूट जाते हैं। औररूठ गया जाने क्यूँ हमसे जाने क्यूँ घर छोड़ गया,नींद उठा के ले गया सारी, खाली बिस्तर छोड़ गया।ख़्ाुद में पाकीज़ा सी ख़्ाुशबू हरदम बिखरी रहती है,

जैसे तुलसी का पौधा वो मेरे अन्दर छोड़ गया। सुनाई। उनकी ये गज़ल भी सभी को छू गई- नये भी हैं पुराने भी, कई$िकस्से है जीने में ज्य़ादा लुत्$फ है उसमें जो $गम जितना पुराना है। कभी तुम जड़ को छूतेे हो, कभी शाख़्ाो को छूते हो,हवा छूकर बता देगी शजर कितना पुराना है? ऐसे कई अनूठे से अशआर् कह के श्री दिनेश ठाकुर ने अपना $खूब रंग जमाया।उनकी एक और गज़ल सभी ने पसंद की-वो ये थी -यही दस्तूर है शायद वफादारी की दुनिया का, जिसे तुम जिस कदर चाहो वही तकलीफ देती है। शिकायत कर रहा था आसमाँ से एक सहरा कल, मुझे ख़्वाबों में अक्सर इक नदी तकलीफ देती है।तनिमा की संपादक शकुन्तला सरूपरिया ने कविता-मोबाईल सैट नहीं होती हैं बेटियाँ एवं एक ग़ज़ल-ज़मीं हूँ मैं खुद ही मैं खुद आसमाँ हूँ, मैं दुनिया में तन्हा मैं खु़द कारवाँ हूँ मेरे बोल मीठे मेरे बोल सच्चे,मैं जिन्दादिली का ख़्ारा ख़्ाुद बयाँ हूँ। उन्होंनेतरन्नुम में पेश कर अपना प्रभाव $कायम किया।कविसम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे श्री किशन दाधीच ने सबसे पहले एक गीत वरिष्ट कवि श्री नन्द चतुर्वेदी के नाम गाया-मुझको डर है तुम जाओगे, एक दिवस सबके, मनबसिया, नन्द तुम्हारे बिन गाएँगे, कैसे हम होरी के रसिया? जिसे सुनकर श्रोतागण विस्मित से रह गये। उनकी चिरपरिचित कविता ज्योतिपुत्रों आपकी सूचना के लिये-ने सभी को प्रभावित किया। वहीं उनकी गाई गज़ल -एक जुलाहा गा रहा है चरखियों की चाल पर,अब तुम्हारी चाल जैसी जि़न्दगी है आजकल, ने उस कवि सम्मेलन को सरस बना दिया।

कवि सम्मेलन के आरंभ में मुख्य अतिथि कारा.ना.विवि की कुलपति प्रो. दिव्यप्रभा नागर ने कहा कि कविता जो अपने परिवेश को संवेदना से भरती है वह इस कठिन समय में सभी के लिये बेहद आवश्यक है। वह कविता ही है जो मनुष्यता को संवेदना से जोड़े रखती है। उन्होंने अपने उद्बोधन में सभी से तनिमा के हाथ मज़बूत बनाये रखने की अपील भी की व संपादक शकुन्तला सरूपरिया के संपादन कौशल की पं्रशसा करते हुए उन्हेंं तनिमा के पाँच वर्ष पूर्ण होने की बधाई दी। विशिष्ट अतिथि जेके सीमेन्ट -निंबाहेड़ा के सलाहकार दोहा सम्राट श्री ए.बी. सिंह ने अपने दोहे सुना कर कवि सम्मेलन को नया माहौल दिया।- नहीं अकेले से चले दुनिया हो या देश, सभी तीन इसमें लगे, ब्रम्हा विष्णु महेश। सरिता जीवन दायिनी धरती मात समान, हर पत्थर शंकर जहाँ वो है हिन्दुस्तान। उन्होंने कहा कि यह दुनिया भले लोगों अच्छे कार्यों पर ही टिकी है, जीवन में हमारा यही प्रयास होना चाहिये कि हम अपने अलावा समाज व देश मानवता के बारे में सोचें। विशिष्ट अतिथि जीबी बिल्डस्टेट के मालिक व समाज सेवी श्री भरत शर्मा ने तनिमा की संपादक शकुन्तला सरूपरिया के 25 कोलाज़ व कविताओं की सूचना केन्द्र कलादीर्घा में फीता काट कर उद्धाटन किया। धन्यवाद की रस्म श्रीमती उषा किरण दशोरा ने अदा की।तीसरे दिन मुशायरा:::::::::

तनिमा के स्थापना दिवस पर स्व: डॉ. भँवर सुराणा स्मृति समारोह के तीसरे दिन सूचना केन्द्र सभागार में ही मुशायरे में उदयपुर व बाहर से आए शायरगणों ने गज़लों व नज़्मों की झड़ी लगादी और मुशायरे को यादगार बनाया। स्थानीय शायर पुष्कर गुप्तेश्वर ने मधुर स्वरों में गाकर वीणावादिनी जय हो माँ -माँ शारदे की वन्दना से मुशायरे का अच्छा आगाज़ किया। उन्होंने अपनी दो उम्दा गज़लें- जैसे दिल का धडक़ना ज़रूरी है, तुम्हारे बिना जिंन्दगी अधूरी है और हौसला तोड़ तोड़ रखता है,वाह क्या ख्ब जोड़ रखता है- सुनाकर सभी को लुभाया, वहीं राजस्थानी में मूंगो घणो मुजरो, सस्तो मती जाण, जैसे दोहे भी सुनाये। उनके बाद शायर इ$कबाल हुसैन इ$कबाल ने अपने कलाम पर खूब दाद लूटी- कभी राज़ ये भी समझ कर तो देखो, किनारों से उलझा समन्दर तो देखो। या- इधर से वार होता है, उधर से वार होता है, बताएँ क्या तुम्हें कैसे स$फीना पार होता है। दोनों पालों में मैं ही खेलूँ, मैं ही फेंकू मैं ही झेलूँ -जैसी $गज़लें सुनाकर उन्होंने सियासत पर तंज किये व दाद पाई। मज़ाहिया अन्दाज़ के शायर जनाब मुश्ता$क चंचल ने तनिमा के नाम सबसे पहले कुछ मिसरे पढे- $खबरें साहित्यिक पढिय़े, मज़मून ताज़ा पढिय़े,जो पढऩी हों नब्ज़े धडक़ने, तो $खरीद के तनिमा पढिय़े। उनके सभी मज़ाहिया $कलाम श्रोताओं के चेहरों पर मुस्कान बिखेर गये। शायर श्री जगजीत सिंह निशात ने तरन्नुम में गाते हुए अपनी ख़्ाूबसूरत सी नई $गज़ल में मौजूदा अख़्ाबारी दुनिया पर तंज कसा कि- कल जो गुज़रा हड़तालों में, घेरावों में और नारों में, सच्चा-झूठा छपा हुआ है देख लो सब अख़्ाबारों में। तूने कितने कै़द किये, मैंने कितने कै़द किये,ऐसी होड़ लगी है छोटी-छोटी सी दीवारों में। घर-घर आँगन-आँगन घूमा, चूल्हा-चूल्हा छान चुका, ये सर्दी कैसे गुज़रेगी, आँच नहीं अंगारों मेंंं। शायरा ज़ौहरा अहसान ने अपनी माँ के उन्वान से बेहतरीन नज़्म कही व अपनी $गजलों पर सब की तारी$फ हासिल की,अपने अहसास की शम्मों को ऐसे गुल कर कर के,

कितने दिन ख़्ाुद को उजालों से बचा पाओगे,या जि़न्दगी ऐसे कटी कोई सज़ा हो जैसे, सने मुझ पर कोई अहसान किया हो जैसे। और महफ़िल जिनमें परवाज़ की ताकत न रही बाकी, उन परिन्दों को घरौंदो में बसाया जाये जैसी गज़लों से अपना शानदार रंग महफ़िल में जमाया। शायर जनाब इकबाल ने चन्द खुले अशआर् भी कहे – अगर जन्नत कहीं होती ज़मीं पर, यहीं होती, यहीं होती होती यहीं पर। या हरे शजर ना सही सूखी घास ही रहने दे, अरे ज़मीं के बदन पर कुछ तो लिबास रहने दे।

उनकी तरन्नुम में पेश की गई गज़ल पराये गम में यूँ आँसू बहाने कौन आता है, पुरानी क़ब्र पर शम्में जलाने कौन आता है? ने सभी को झूमने पर मज़बूर कर दिया। हमें इस बात पर ही सबसे पहले $गौर करना है पड़ौसी को पड़ौसी को लड़ाने कौन आता है?

तनिमा की संपादक शकुन्तला सरूपरिया ने बेटियों के कोख में मारे जाने पर गज़ल कही-पराया धन क्यूँ कहते हो तुम्हारा हीखजाना हूँ जीने दो कोख में मुझको मैं जीने का बहाना हूँ। साथ में ही उन्होंने अपनी नज़्म-ये बेटियाँ हैं कहानियाँ कि कहानियों सी बेटियाँ-हर ज़ुल्म के निशाने पे निशानियों सी बेटियाँ- सुनाकर सभी को सोचने पर मज़बूर कर दिया।

दिल्ली से आये अनस खान ने दोहे व अशआर् कहे- महानगरों की जि़ंदगी पर उन्होंने कुछ यूँ बात रक्खी- मुख़्तसिर सी उम्र में बस एक जवान रहती है, ना कोई दादी रहती है ना कोई नानी रहती है। सबने इसे पसंद भी किया।




मंगलवार, अगस्त 31, 2010

राष्ट्रीय कवि संगम

   गत दिनों जयपुर में आयोजीत राष्ट्रीय कवि संगम की  काव्य गोष्ठी में  कार्यक्रम के मुख्य अतिथि माननीय इन्द्रेशजी ने  कहा की  कवि का निर्माण विश्व के किसी भी प्रशिक्षण संस्थान में नहीं होता क्योंकि कविता तो प्रकृति का वरदान है और अभ्यास करते करते व्यक्ति कवि बन जाता है।  कवि चन्द्रबरदाई की पंक्तियॉ “चार बांस, चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, तहाँ बैठो सुल्तान है, मत चुको चौहान” या बंकिम चन्द्र चटर्जी द्वारा रचित “वन्दे मातरम्” या सुभद्रा कुमारी चौहान की “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी” के  अनेक उदाहरण   से राष्ट्र की  आजादी आन्दोलन में कवि और कविता के योगदान की चर्च करते हुए   कवि समाज को  राष्ट्रीय नव निर्माण में सामूहिक भूमिका निभाने का आव्हान किया !  राष्ट्रीय कवि संगम के राष्ट्रीय सयोजक श्री जगदीश मित्तलजी  के संयोजन  में गुलाबी नगर के कवियों, गीतकारों ने देर रात तक देशभक्ति एवं सामाजिक सरोकारों से ओत-प्रोत  गीतों, ग़ज़लों कविताओं एवं दोहों की त्रिवेणी से जमकर रस बरसाया। कार्यक्रम के मुख्‍य अतिथि अलवर से पधारे वीररस के वरिष्ट्र   कवि बलवीर सिंह "करुण"   थे! विशिष्ट अतिथि काव्यलोक के अध्यक्ष नन्दलाल सचदेव एवं देश के ख्यातनाम हास्यव्यंग कवि बंकट बिहारी पागल थे।   
सर्व प्रथम जयपुर की शोभा चन्द्र   की सरस्वती वंदना के पश्च्यात  रास्ट्रीय कवि संगम के सयोजक जगदीश मित्तल ने सभी कलमकारों का स्वागत करते हुए कहा की   राष्ट्रीय कवि संगम देश भर में छुपी उन प्रतिभाओं को तलाशने और मंचीय प्रस्तुति के लिए उन्हें दक्ष करने का काम संगम बखूबी कर रहा है। संगम का स्पष्ट मानना है, कविता किसी भी विधा में लिखी जाए, यदि वह समाज को कोई सार्थक संदेश नहीं देती फिर उस कविता का होना ना होना बराबर है। संगम की गोष्ठियों में खास बात यह है कि इसमें  छंद, दोहा, गजल, हास्य जैसी काव्य विधाओं के उस्ताद भी शरीक होते हैं। ये लोग युवा कवियों को प्रशिक्षित और प्रेरित भी करते हैं। जयपुर के सदाकन्‍द पसंन्‍द शायर रजा शैदाई ने अपने देशभक्ति के जज्बे को कुछ इस तरह प्रस्तुत किया " लहराएगा तिरंगा ही अब आसमान पर भारत का नाम होगा सभी की जुबान पर, ले लेंगे जान उसकी या खेलेंगे जान पर, कोइ उठाये आँख तो हिंदुस्तान पर" कवि उमेश उत्साही ने चेतक एवं रांणा  प्रताप की यश गाथा में  मेवाड़ की वीरता का बखान किया तो अब्दुल गफ्फार इन दिनों चर्चा में रहे सोनिया—शोएब रिश्ते पर खुलकर बोले और कहा कि : फूल तुम्हारे घर—आंगन का निश्चित मानो नहीं खिलेगा। तुम जैसों से हम जैसों का ये सिंहासन नहीं हिलेगा।। सुनो सानिया मिर्जा! तुमको साफ—साफ बतलाता हूं, भारतीय शौहर के जैसा पाकिस्तान में नहीं मिलेगा। कवि अब्दुल अय्यूब गौरी ने केसर की क्यारी में तुमको ईद न मनाने देंगे, काश्मीर में तुमको कौमी ध्वज न फहराने देंगे पंक्तियों के साथ आतंकियों को ललकारा। संपत  सरल ने  हास्य व व्यंग्य रचना बातचीत  के साथ गुदगुदाने, मुस्काने व जोरदार ठहाके लगाने को मजबूर किया। जालोर से आये  शायर एवं पूर्व मंत्री जोगेश्‍वर गर्ग के अशआरों ने खूब दाद पायी 'करें है याद भी गर तो सताने के लिये कोई, हमारा नाम लिखता है मिटाने के लिये कोई, तेरी महफिल से उठ कर आ गया उम्‍मीद ये लेकर, पीछे आ रहा होगा, मनाने के लिये कोई। और व्‍यवस्‍थाओं पर चोट करते हुए जोगेश्‍वर ने इस अंदाज में कहा 'मौन शंकर मौन चंण्‍डी देश में, हो रहे हावी शिखंडी देश में, है टिका आकाश इनके शिश पर, सोचते हैं कुछ घंमडी देश में। कवि सोहन प्रकाश "सोहन" ने मानवीय संवेदना के गिरते परिवेश में भी प्यार की बात कही " संबंधो का अर्थ खो चुका, सवेदन अब शेष नहीं , वर्तमान में इस धरती पर, रक्तहीन परिवेश नहीं है, तू धरती के यमराजो को जीवन राग सुनाये जा, हृदाहिनता के इस युग में, गीत प्यार के गए जा "  वरिष्ठ हस्व्य कवि बंकट  बिहारी "पागल" मानव की विवशता को इन शब्दों में पिरोया" में जिन्दा नहीं  जिन्द हूँ  , वो भी अलादीन के चराग का, में जरिया भर हूँ बी बी बच्चों के पेट की आग का " काव्‍यालोक के अध्‍यक्ष नन्‍दलाल सचदेव ने युवाओं  की ओर मुखातिब होते हुए कहा " ऊँची उड़न जारी रख,आसमा चुने की तयारी रख, होसलें जिनके हो बुलंद, उनकी धडकनों से यारी रख" मालपुरा के युआ कवि शहनाज़ हिन्दुस्तानी ने शहीद भगतसिंह के बलिदान पर शब्द्पुष्प अर्पित किये  हुआ हुकम जब फांसी का तो, भगत सिंग यूँ  मुस्काया , बोला माँ अब गले लागले, मुद्दत में मोका आया , तखते फांसी कूच पे जब, क़दमों की आहत आती थी, तो दीवारे भी झूम झूम कर वन्दे मातरम गाती थी"  गोष्‍ठी का संचालन करते हुवे कवि किशोर पारीक 'किशोर' ने आपनी ओज भारी रचना " भ्रस्ट राष्ट्रों में गणना भारत की जब जब होती है, भगत सिंह आजाद पटेल की रूह बिलख कर रोटी है " सुनाकर ललकारा "   कवि वैघ भगवान सहाय  ने पाकिस्‍तान एवं अमेरिका की दोस्‍ती पर व्‍यंग्‍य गीत पढा ' पाला आज सपोला कल होगा बिकराल सपेरे विषधर मत पाल'सुनाकर सत्ता को नसीहत दी . गोष्ठी में जो चंदर प्रकाश चंदर, रमेश पंचाल, चित्तोड़ के नवीन " पार्थ", केसर लाल, योगेश्वर शर्मा, आत्माराम सिंघल, अशोक पराशार,प्रेम "पहड्पुरी"हास्य कवि शंकर "शिखर" युवा गीतकार कविन्द्र ठाकुर, कवयित्री विमला शर्मा वीनू , प्रवीण मस्त, मुकेश गुप्ता राज ने भी अपनी  अपनी रचनाओं से खूब दाद पाई ! अंत   में मालपुरा की विधायक रणवीर पहलवान ने आभार ज्ञापित किया !  

रविवार, मई 16, 2010

परिंदा कह गया हमको, खुदा हाफिज़ मेरे यारो

शेर-ए-राजस्थान पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत बाबोसा एवं ढूढाडी के वरिष्‍ठ कवि बुद्विप्रकाश पारीक को जयपुर के साहित्‍यकारों द्वारा शब्‍दाजंली



शेर-ए-राजस्थान वजीर सदन,आदर्श नगर में जयपुर की प्रमुख साहित्यिक संस्‍था काव्‍यालोक द्वारा आयोजित काव्‍याजंली सभा में शेर-ए-राजस्थान पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत बाबोसा एवं ढूढाडी के वरिष्‍ठ कवि बुद्विप्रकाश पारीक को गुलाबी नगर के कवियों, गीतकारों ,एवं शायरों रविवार देर रात तक अपने गीतों गजलों एवं दोहों के माध्यम से काव्यांजलि अर्पित की। ढूढाडी के वरिष्‍ठ गीतकार बिहारी शरण पारीक की अध्‍यक्षता एवं किशोर पारीक के सञ्चालन में आयोजित इस काव्‍यांजली में
जयपुर के नामी शायर ईनाम शरर ने अशआर में कहा '
बांटते दुनियां को  उजाला सूरज, किसको मालूम था हो जायेगा वही काला सूरज, गर्दिशें जितनी होगी किस्‍मत में, कल भी निकलेगा यही डूबने वाला सूरज'
 एवं नमन कर रहे है उसे, धरती और आकाश,
फैलाई जयपुर में जिसने, बुद्वि का प्रकाश'
गीतकार सुरेन्‍द्र शर्मा ने अपनी कविता में इन दोनो के विछोह के दर्द का कुछ यों बयां किया ।
'कितनी बार याद आते हो,
अनगिन बिम्‍ब बना जाते हो,
मन के शीश महल में आकर
पल में औझल हो जाते हो,
संघर्षों के सुधी शायर रज़ा शैदाई ने अपने तरन्नुम भरे अंदाज़ में भैरोंसिंह शेखावत एवं  कवि बुद्विप्रकाश पारीक को समर्पित ये अशआर पढ़कर खूब दाद पायी ।
' मुददतों रोयेगी दुनियां वो बशर जाता रहा,
ऐहले दिल जाता रहा, ऐहले नजर जाता रहा,
वो तस्‍सबुर ही सही होती तो है कुछ गुफतगु
क्‍या करेंगे ये सहारा भी जाता रहा '
वरिष्‍ठ शायर हिम्मत सिंह बारहट शाद ने बड़े ही खूबसूरत लफ़्ज़ों में बिछोह के दर्द को व्‍यक्‍त किया। 
मै जिया अलमस्‍त होकर, रूला न सकी दुश्‍वारियॉं जमाने की,
कफन हटाके देख लो, मुझको आदत है मुस्‍कुराने की  
युवा गीतकार रविन्‍द्र ठाकुर ने निम्‍न पक्तियों से दोना शक्शियतों को श्रद्वाजंली अर्पित की ।
प्रीत कहूं तो असे हो आखों में नीर,
मेरे नयनो से झरे तेरे मन की पीर
सांझ बीती भौर आई मीत फिर तुम याद आए'
वरिष्‍ठ शायर तबस्‍सुम रहमानी ने अपनी गजल के इन शेरों द्वारा श्री शैखावत एंव बुद्विप्रकाश पारीक को शब्‍दाजंली अर्पित की।
' नज्र औरों को जो अपनी, हर खुशी करता रहा
जो बसर अपनी अदा से, जिन्‍दगी करता रहा
ढूंढ कर लायें कहीं से काई अब उसका जवाब
जख्‍म खाकर जो शजुफता, शायरी करता रहा'
कलम के अनूठे चितेरे कवि मुकुट सक्‍सेना ने बुद्विप्रकाश पारीक के संस्मरण के साथ अपने भावों को यों बयां किया.

जितने मन बहलाने को जीवन के नाम धरे,
उतनी अनजानी पिडासे आंसू ओर झरे
किन्तु पूरानी यादों का संबल ऐसलागता है,
कोइ बुझे दीजे में फिर से तेल भरे
काव्‍याजंली कार्यक्रम का संचालन करते हुवे कवि किशोर पारीक ' किशोर' ने अपने मुक्‍तक से श्रद्वाजंली अर्पित की
परिंदा कह गया हमको, खुदा हाफिज़ मेरे यारो
चमन में चह चहे कायम,रहे हरगिज़ मेरे यारो
हमारा फ़र्ज़ है महफिल में, केवल शायरी होवे
लतीफे बज़्म में ना हो, कभी काबिज़ मेरे यारो
काव्यांजलि सभा की अध्‍यक्षता करते हुए ढूढाडी के वरिष्‍ठ गीतकार बिहारी शरण पारीक ने अपनी ढूढाडी रचना के मद्यामसे उद्गार व्यक्त किये
नित्य गढ़-गढ़ मुरत्यां, विधना करे अभ्यास छै,
लाख में से एक कोइ, बण्यो बुद्धि प्रकाश छै,
सुरग में उत्सव हुयो, धरा पर मातम छायो
अंजुमन बेनूर,कवि मजबूर घणा उदास छै
काव्‍यालोक के अध्‍यक्ष नन्‍‍दलाल सचदेव ने बुद्धि प्रकाश जी की गगन समान व्यक्तिता एवं कृतित्व को कुछ इस अंदाज़ में पेश किया !
जो कविता की प्यास था, आसपास था, आम था पर खास था ,
हास्य का अहसास था, वो बुद्धि का ही प्रकाश था ,
कविता की लो लगा गया, गीत गयल ज़गा गया ,
गज़ब का काव्य तराश था, ऊँचाई में कैलाश था,
करते शत शत नमन, वीणा पानी अरदास था
अपने दोहों एवं गीतों के लिए अलग पहचान रखने गुलाबी नगर के गीतकार बनज कुमार'बनज'ने श्रद्वासुमन अर्पित करते हुए अपनी पक्तियों में कहा।

'पहले सारे काम करूंगा, फिर जाकर आराम करूंगा,
सूरज का वंशज हूं यारों, सोच समझ कर शाम करूंगा।
ख्‍यातनाम हास्‍य कवि सुरेन्‍द्र दुबे ने भैरों सिंह शैखावत एवं बुद्विप्रकाश पारीक को काव्‍यांजली अपिंत करते हुए श्रद्वाजंली गीत एवं अपनी व्‍यग्‍य रचना सरस्‍वती जी का त्‍यागपत्र पढा । गोष्ठी में अजीज अय्यूबी ,सुशीला मीना,  शिव चंद जैन, दर्द अकबराबादी, आलोक चतुर्वेदी, लोकेशकुमार सिंह साहिल, अखिलेश तिवाडी, सोहनलाल अग्रवाल, विशन कुमार अनुज, प्रवीण मस्‍त, चम्‍पालाल चोरडिया ' अश्‍क' ने भी अपने शब्‍द सुमन काव्‍याजंली द्वारा पेश किये। अन्‍त में सभी साहित्‍यकारों द्वारा मौन श्रद्वाजंली अर्पित की गई ।
प्रस्‍तुति किशोर पारीक ' किशोर'
 

शुक्रवार, मई 14, 2010

बेट्याँ पूजी जाय जठे छै, वीं घर में भगवान छै बेट्याँ बिना अलूणों घर छै, मीठा बिन पकवान छै

बेट्याँ पूजी जाय जठे छै, वीं घर में भगवान छै बेट्याँ बिना अलूणों घर छै, मीठा बिन पकवान छै
 खूब जमाँ राजस्थानी भाषा कवि सम्मलेन
राजस्थानी  भाषा की मिठास ओर उसके देशज शब्दों से आती माटी की सोंधी महक से बुधवार १२ मई को जयपुर के रविन्द्र मंच की  शाम  गुलज़ार  हो गई |अवसर था राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर, सबरंग संगीत संस्थान व रविन्द्र मंच सोसाइटी की ओर से आयोजित राजस्थानी भाषा कवि सम्मलेन |
          रविन्द्र मंच के मुख्य सभागार में राजस्थानी मायड भाषा के देश के ख्याति प्राप्त कवियों कल्याणसिंह राजावत, मुकुट मनिराज, शकुंतला सरूपरिया, बिहारी शरण पारीक, किशोरजी किशोर एवं भवंर जी  भंवर ने इस सवा घंटे  की महफ़िल को खुशनुमा बनाकर अपने काव्य रस की वर्षा से श्रोताओं को जमकर गुदगुदाया। 
           कवि सम्मलेन की शुरुआत में हाडोती कवि मुकुट मणिराज ने माँ सरस्वती  के चरणों में निम्न शब्दों  से अपने भाव सुमन अर्पित किये "म्हारी जीभ की जाजम पे डोरा ड़ाल दे,म्हारा हिरदे का चौका पे गाडी गाळ दे" एवं अपना गीत छोरी आती जाती होगी को सुनाकर श्रोताओं को नव विवाहिता के जीवन में आये बदलाव से रूबरू कराया!
        इसके बाद कवि सम्मलेन के संयोजक किशोर पारीक "किशोर" ने  बेटियों पर केन्द्रित कविता "बेट्याँ पूजी  जाय जठे छ, वीं  घर  में  भगवान छ बेट्याँ बिना अलूणों घर छ मीठा बिन पकवान छ  "सुनाकर आँखे नम कर दी |
        गुलाबी नगरी के वरिष्ट कवि भवरजी भवर  ने अपने काव्यात्मक परिचय में ही सबके तालियाँ एवं ठहाके बटोर लिए |उनके गीत बोली भूल्या पुरर्खां की" पर  देशज  भाषा की  मिठास  ओर भंवर के प्रस्तुतिकरण  से आल्हादित  सभागार देर तक तालियों से गूंजता रहा |
उदयपुर से आई कवयित्री शंकुंतला सरूपरिया ने  गीत " धीमे धीमे चाल्यो चांद, होले होले चाल्यो चांद,सिली सिली रात समेटे सियाला रो चांद, उतरयो रे मंदरो मंदरो चांद" सुना कर सबका दिल जीत लिया | 
       ढूढाडी के वरिष्ट कवि बिहारीशरण पारीक ने अपनी ढूढाडी रचना "सुणज्यो म्हामे काई बीती एक बार बफर का खाना में" के माद्यम से बफर भोज की विसंगतियों पर जम कर व्यंग के तीर चलाये व श्रोताओं को ठहाके  लगाने पर  मजबूर कर दिया !  
              राजस्थानी के वरेण्य कवि कल्याण सिंह   राजावत ने  अपनी चिरपरिचित रचना लीरा लीरा जिन्दगी जमारो जिया तो करो ,थोड़ी थोड़ी प्रीत री  मद  पिया तो  करो सुनाकर श्रोताओं  को  जाती लिंग, गरीबी अमीरी के भेद को भुला कर जीवन जीने की प्रेरणा दी|
      कवि सम्मलेन का संचालन कर राहे कवि संपत सरल ने अपनी हिंदी व्यंग  रचना "गुरु शंख चेले धफोल शंख" सुनाकर शिक्षा व्यवस्था पर व्यंग वाण छोड़े !  कवि सम्मलेन के मुख्य अतिथि प्रमुख शासन सचिव कला एवं संस्कृति उमराव सालोदिया एवं अध्यक्ष  वरिष्ट कांग्रेस नेता राजीव अरोड़ा ने की ! अंत में राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर के सचिव प्रथ्वीसिंह  रतनु ने आभार ज्ञापित किया! बड़ी संख्यां में काव्य रसिकों ने अस राजस्थानी कवि सम्मलेन का लुफ्त लिया|

प्रस्तुति - किशोर पारीक "किशोर"

 

शनिवार, मई 08, 2010

राजस्थानी ढूंढाड़ी के पितामह बुद्धि प्रकाश पारीक


ढूंढाड़ी के पितामह बुद्धि प्रकाश पारीक


गुलाबी नगर जयपुर के  प्रख्यात हास्य कवि , राजस्थानी  ढूंढाड़ी के पितामह बुद्धि प्रकाश पारीक   का २२ अप्रैल   को  जयपुर  में निधन हो गया। बुद्धि प्रकाशजी  ने अपनी सहज, सरल  ढूंढाणी भाषा में विशेष रूप से व्यंग्यात्मक काव्य के द्वारा अपनी एक खास पहचान बनाई। वे राजस्थानी भाषा के अतिरिक्त हिंदी, उर्दू व ब्रज भाषा में भी पूर्ण अधिकार पूर्व काव्य सृजन करते थे। प्रकाशित कविता संग्रह में चूंटक्यां, चबड़का, तिरसा, कलदार, सिणगार, मैं गयो चांद पर एक बार, नाक और इंदर सूं इंटरव्यू इनकी खास रचनाएं थीं, उनका एक समग्र मै ‘मै‘ भी प्रकाशित हो चुका है।  इन रचनाओं की  बदौलत उन्होंने कई दशकों तक श्रोताओं के दिलों पर राज किया। आज के भड़ैती भरे काव्य मंचोंपर उनकी उपस्थिति मात्र से बल मिलता था। वे आंचलिक बिंबों के प्रयोगधर्मा कवि के रूप मे याद किये जायेंगे।
          मेरे पिताश्री बिहारी शरण जी उनके शिष्यों में से होने के कारण  मैं भी गत १० वर्षों से बुद्धि प्रकाशजी के सानिद्य में कविता की  पाढ्शाला  जय साहित्य संसद  का विद्यार्थी था। विगत ५ दशकों से प्रत्येक  माह के अंतिम रविवार को जय साहित्य संसद की उनके घर पर काव्य गोष्ठी की निरंतरता अदभुद थी। कविता के प्रति उनकी निष्ठा इस बात से रेखंकित की जा सकती है की परिवार में शादी, उत्सव  यहाँ  तक की गमी में भी उनने काव्य गोष्ठी नहीं रुकने दी ।  उनको कवि रत्न, साहित्यश्री, लंबोदर, मिर्जा गालिब व मारवाड़ी सम्मेलन का सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया गया। गत वर्ष नवम्बर माह में जयपुर समारोह के अवसर पर राजस्थानी भाषा साहित्य अकादमी बीकानेर द्वारा जयपुर में उन्हें सम्मानित किजा गया । ब्रज भाषा अकादमी की ओर से भी उन्हें सम्मानित किया गया था !
      बुद्धि प्रकाशजी स्वभाव से जितने मिलनसार, हंसमुख और सहज थे, उतनी ही सहज उनकी लेखनी भी थी। कहीं कोई क्लिष्टता नहीं, बनावट नहीं। वे पारदर्शी कवितायें रचते रहे। जिस तरह स्वच्छ जल को अंजुरी में लेकर उसमें झांकने पर स्वयं की हथेली और उसकी रेखायें नजर आती हैं, कुछ इसी तरह जिसने भी बुद्धि प्रकाशजी को पढ़ा या मंच पर कविता पढ़ते हुये सुना है, उसे अनुभव हुआ होगा। उनकी कविताऒं ने  समकालीन भारतीय समाज की अनेक विसंगितियों की झलक साफ दिखाई पड़ती हैं। अपनी रचनाऒं में इतना सरल, सपाट और सहज दीखते थे  कि एक बारगी  उनकी कविताऒं पर किसी अतिरिक्त टिप्पणी की आवश्यकता महसूस नहीं होती ।बुद्धि प्रकाशजी की सृजन प्रतिभा को किसी विधा विशेष में नहीं बांधा जा सकता। वे गीत भी रचते रहे ग़ज़ल और दोहे भी। उन्होंने गद्य में भी लेखनी चलायी। जयपुर की कविता परम्परा से व्यंग्य विनोद को आलंबन के रूप में ग्रहण करते रहे। छंद को तोड़ा नहीं लेकिन शिष्टता और विशिष्टता का परिधान पहनाकर अपने रचनाऒं को भदेसपन से बचाते रहे। वे अक्सर अपनी बात कहने के लिये रस्सी का दूसरा सिरा पकड़ते थे। उनकी ‘ईं मिन्दर से कोइ म्हारी लग्यो ज्यूंता चोर‘ में गयो पूछ्बा समंचार‘ कविताऒं में इसे महसूस किया जा सकता है।

किशोर पारीक किशोर

बुधवार, मई 05, 2010

अच्छे इन्सान का बरसों में जन्म होता है, ऐसा इन्सान चला जाये तो गम होता है. मुद्दतों रोयेंगे सब ही वो बशर जाता रहा, एहले दिल जाता रहा, एहले नज़र जाता रहा"

कवि बुद्धिप्रकाश पारीक को कवियों  ने दी काव्यांजली 
प्रताप   नगर, जयपुर में आयोजित लेखनी साहित्यिक संस्था  जयपुर की मासिक काव्‍यगोष्‍ठी में ढूढाडी के वरिष्‍ठ गीतकार बुद्विप्रकाश पारीक को गुलाबी नगर के कवियों, गीतकारों ,एवं शायरों  रविवार  देर रात तकअपने गीतों गजलों एवं दोहों के माध्यम से काव्यांजलि अर्पित की! ढूढाडी के वरिष्‍ठ गीतकार बिहारी शरण  पारीक की अध्‍यक्षता एवं किशोर पारीक के सञ्चालन में आयोजित कवियों के सर्व प्रथन  वेद्य भगवानसहाय ने माँ शारदा की वंदना से गोष्ठी का आगाज़ किया ! संघर्षों के सुधी शायर रज़ा शैदाई ने अपने तरन्नुम भरे अंदाज़ में अशआर  पढ़कर खूब दाद पायी  . "
अच्छे इन्सान का बरसों में जन्म होता है,
ऐसा इन्सान चला जाये तो गम होता है.
मुद्दतों रोयेंगे सब ही वो बशर जाता रहा,
एहले दिल जाता रहा, एहले नज़र जाता रहा"
काव्‍यालोक के अध्‍यक्ष नन्‍दलाल सचदेव ने बुद्विप्रकाश पारीक को  श्रद्वाजंली अर्पित करते हुवे गीत पढा! '
माना हो जायेगे इक दिन मंच से किरदार गुम,
जिंदगी से हो ना पायेंगे कभी आधार गुम,
रास्‍ते खोले  बहुत आमद बढी रफतार भी,
सर से होते जा रहे है, पेड छायादार गुम।
अपने दूसरे गीत में नन्‍दलाल सचदेव ने बुद्धि प्रकाश जी की गगन समान व्यक्तिता एवं कृतित्व    को कुछ इस अंदाज़ में पेश किया !
जो कविता की प्यास था, आसपास था, आम था पर खास था ,
हास्य का  अहसास था, वो बुद्धि का ही प्रकाश  था ,
कविता की लो लगा गया, गीत गयल ज़गा गया ,
गज़ब का काव्य तराश था, ऊँचाई में कैलाश था,
करते शत शत नमन, वीणा पानी अरदास था
गोष्‍ठी का संचालन करते हुवे कवि किशोर पारीक 'किशोर' ने बुद्विप्रकाश पारीक का स्मरण करते huee  अपने ढूढाडी गीत की इन पंक्तियों से अपने माँ की वेदना को व्यक्त किया.
मायड भाषा मोन हुई अब, हुयो घणो नुकसान छै

झरता नेना नीर थम्या सब, गीत ग़ज़ल मुस्कान छै,
दीप भुज्यो ढूंढाड़ी को तो, सगळा ही हैरान छै
जेपर म्हांको कविवर थां बिन, दीख रह्यो वीरान छै,
थाने म्हें आकाश कहूं , या छाया हालो दरख कहूं
आँख्यां सूं हरदम झरवालो, कविवर थांने हरख कहूं,
संसद छ चोपाल काव्य की, ढूंढाड़ी की शान छै
कलम के अनूठे चितेरे कवि मुकुट सक्‍सेना ने बुद्विप्रकाश पारीक के संस्मरण के साथ अपने भावों को यों बयां किया.
जितने मन  बहलाने को जीवन के नाम धरे,
उतनी अनजानी पिडासे आंसू ओर झरे
किन्तु पूरानी यादों का संबल ऐसलागता है, 
कोइ बुझे दीजे में फिर से तेल भरे  
बृजभाषा के वरिष्‍ठ कवि नाथूलाल महावर अपने दोहों  के माध्यम से अपने भावों को व्यक्त किया.
सूर गए, तुलसी गए,गए वे केशवदास,
उनके पीछे अब गए, कविवर बुद्धि प्रकाश
जिनने जीवन में जिया, मधुरस हास्य हुल्लास
अमर हास्य को कर गए, कविवर बुद्धि प्रकाश
वरिष्‍ठ शायर हिम्मत सिंह बारहट शाद ने बड़े ही खूबसूरत लफ़्ज़ों में अपनी बात कही .
सफ़र हयात का यों तयकर गया कोइ
बड़े करब से उठकर चला गया कोइ,
बुद्धि प्रकाश के काव्य से आत्मसात  हुए  तो
यों लगा जैसे शब्दों में, मोती पिरो गया कोइ
शायर प्रेम पहड्पुरी ने कहा
ममता उठी धरा बन गयी, ओर प्यार आकाश बनगया
इतना स्नेह दिया था सबको, जो की आज संत्रास बन गया
काव्यांजलि सभा की   अध्‍यक्षता करते हुए  ढूढाडी के वरिष्‍ठ गीतकार बिहारी शरण पारीक ने अपनी ढूढाडी रचना के मद्यामसे उद्गार व्यक्त किये
नित्य गढ़-गढ़ मुरत्यां, विधना करे अभ्यास छै,
लाख में से एक कोइ, बण्यो बुद्धि प्रकाश छै, 
सुरग में उत्सव हुयो, धरा पर मातम छायो
अंजुमन बेनूर,कवि मजबूर घणा उदास छै  
 गोष्ठी में  चन्‍द्र पकाश चन्‍दर, अजीज अय्यूबी ,सुशीला मीना, शोभा चंदर, कविन्द्र ठाकुर, अब्दुल गफ्फार, भव्य सोनी, महावीरसोनी,देवशर्मा, शिव चंद जैन , ने भी काव्‍य पाठ किया ।  अन्‍त में लेखनी साहित्यिक संस्था जयपुर की अध्‍यक्ष विमला शर्मा वीनू   ने आभार ज्ञापित किया।

प्रस्तुति . किशोर पारीक

गुरुवार, अप्रैल 29, 2010

ढूंढाड़ी कवि बुद्धिप्रकाश पारीक नहीं रहे

हिंदी और राजस्थानी भाषा के जानेमाने कवि बुद्धि प्रकाश पारीक का जयपुर में 22 अप्रेल गुरुवार को  निधन हो गया। वे 87 वर्ष के थे। दोपहर बाद उनका अंतिम संस्कार कर किया गया, जहां बड़ी संख्या में साहित्यकार उपस्थित थे।
पारीक ने ढूंढाणी भाषा में विशेष रूप से व्यंग्यात्मक काव्य के द्वारा अपनी एक खास पहचान बनाई। वे राजस्थानी भाषा के अतिरिक्त हिंदी, उर्दू व ब्रज भाषा में भी पूर्ण अधिकार पूर्व काव्य सृजन करते थे। चूंटक्यां, चबड़का, तिरसा, कलदार, सिणगार, मैं गयो चांद पर एक बार, नाक और इंदर सूं इंटरव्यू इनकी खास रचनाएं थीं, जिनकी बदौलत उन्होंने कई दशकों तक श्रोताओं के दिलों पर राज किया। उनको कवि रत्न, साहित्यश्री, लंबोदर, मिर्जा गालिब व मारवाड़ी सम्मेलन का सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया गया। उनके निधन पर बिहारी शरण पारीक, किशोर जी किशोर, शोभा चंदर पारीक, चंद्रप्रकाश चंदर, गोविंद मिश्र, नंदलाल सचदेव, चंपालाल चौरड़िया, फारुख इंजीनियर और रफीक हाशमी सहित बड़ी संख्या में साहित्यकारों और साहित्य अनुरागियों ने शोक व्यक्त किया है।

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